शहर से करीब पांच किलोमीटर दूर प्रेम सिंह की बगिया में साहित्यकारों, चिंतकों एवं विचारकों का डेरा है। सभी के अपने-अपने तर्क है। पूरा परिसर चिंतन, मनन करने वालों की भीड़ से भरा है।
अलग-अलग सत्र में बंटी इस कार्यशाला में शब्दों से मुठभेड़ चल रही है। सभी के तर्क अलग हैं, लेकिन जातिवाद और उत्पीड़न के सवाल पर सभी के अर्थ एक जैसे हैं।
जनवादी लेखक संघ की तीन दिवसीय कार्यशाला में सुबह से ही साहित्यकारों, लेखकों एवं विचारकों का जमावड़ा लगना शुरू हो गया था। कुछ तो गुरुवार रात में ही पहुंच गए थे। सुबह इलाके में अलग तरह की शख्यियतें दिखाई पड़ी।
लंबी दाड़ी, हवाई चप्पल और कंधे पर टंगा झोला एक अलग तरह के परिवेश की छाप छोड़ रही थी। करीब 11 बजे पहले भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी मार्क्सवादी के पूर्व महासचिव प्रकाश करात ने कार्यशाला का उद्घाटन किया।
पहले सत्र को संबोधित करते हुए प्रकाश करात ने कहा कि संप्रदायवाद कभी भी समाज व देश के लिए न तो हितकर था और न ही रहेगा। इसे बढ़ावा देने वाली ताकतों को नेस्तनाबूत करना होगा। उन्होंने कहा कि भारत में वर्गीय शोषण को खत्म करना है तो जातिगत उत्पीड़न के खिलाफ आवाज बुलंद करना होगा।
करात ने इतिहासकार डीडी कोसांबी के हवाले से कहा कि जाति व्यवस्था हमारे यहां उत्पादन संबंधों का हिस्सा रही है। इसके खात्मे की उम्मीद पूंजीवाद के दौर से लगाए बैठे हैं, लेकिन यह उम्मीद गलत साबित हुई। आज जब भारत भी उत्पादन पद्धति पूंजीवादी है और जातीय व्यवस्था कायम है।
इससे पहले उद्घाटन सत्र का संचालन कर रहे लेखक बजरंग बिहारी ने कार्यशाला की पृष्ठभूमि और ब्योरा पेश किया। मेजबान जनवादी लेखक संघ के स्थानीय संयोजक सुधीर सिंह ने बताया कि कार्यशाला मेें नौ प्रांतों से आए लेखक व विचारक भाग ले रहे हैं।
प्रगतिशील किसान प्रेम सिंह ने अतिथितियों का स्वागत किया। चार अक्तूबर तक चलने वाली कार्यशाला में मुख्य विषय- आंबेडकरवाद और मार्क्सवाद : पारस्परिकता के धरातल में निर्धारित है। रोजाना इसी से जुड़े विभिन्न विषयों पर परिचर्चा होगी।