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पीएम की बात पर अमल से बनेगी बात

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बांदा। बुंदेलखंड के किसानों के लिए मानसून एक मौका है। मिशन चलाकर खेत में रोकें पानी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की रविवार को हुई मन की बात पर इसी से बनेगी बात। अधांव गांव की तर्ज पर हर गांव में खेत का पानी खेत में अभियान चलना चाहिए। बुंदेलखंड में मानसूनी बारिश का औसत 800 से 900 मिमी है। इस पानी को सहेज लिया जाए तो किसानों के अच्छे दिन आ सकते हैं।
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रविवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा बांदा जनपद के अधांव गांव में चल रहे खेतों में मेड़ बनाकर पानी रोकने के मिशन की सराहना की। इस गांव में मेड़बंदी का यह मिशन तीन वर्ष पूर्व शुरू हो गया था। कुछ किसानों ने अपनी पूंजी से तो कुछ ने ग्राम पंचायत निधि से मेड़ बनवाई। गांव में अब तक 300 बीघा से ज्यादा खेतों में मेड़ें बन चुकीं हैं। गांव के किसान बारिश का पानी बहकर बर्बाद होने से रोकने के लिए हरेक खेत में मेड़ बना रहे हैं। इसका मकसद यह है कि बारिश के पानी को खेत में ही रोक लिया जाए और बहकर बेकार न जाने पाए। किसानों की इस कोशिश को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अभियान का नाम दिया है। फतेहपुर जनपद की सीमावर्ती अधांव गांव जिला मुख्यालय से लगभग 60 किलोमीटर दूर बबेरू विधान सभा क्षेत्र में आबाद है।
लगभग तीन हजार आबादी वाले इस गांव में कृषि भूमि का रकबा तकरीबन 3500 बीघा है। यूं तो गांव में केनाल नहर है, लेकिन गांव के सभी खेतों को पानी पहुंचा पाने में यह नाकाफी है। ज्यादातर किसान बरसाती पानी की खेती पर ही निर्भर हैं। इसमें वह साल में बमुश्किल एक फसल ले पाते हैं। गांव के कुछ किसानों की सोच के नतीजे में यहां बदलाव आ रहा है। यहां के किसानों ने खेत का पानी खेत में, गांव का पानी गांव में का नारा देते हुए खेतों में मेड़बंदी शुरू की है। करीब पचास से ज्यादा किसानों ने खेतों में मेड़ बना ली है, जिससे लगभग तीन महीनों में बरसने वाला पानी बहकर नाले नदियों तक नहीं जा रहा और खेतों में ही ठहर रहा है। मानसूनी मौसम के बाद भी किसानों को काफी दिनों तक यह पानी खेत में नमी दिए रहता है। मेड़बंदी वाले खेतों में अब दो फसलों का सिलसिला शुरू होने लगा है।
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अधांव गांव में जारी है जल संरक्षण मिशन
अधांव गांव में जल संरक्षण के लिए सुगबुगाहट वर्ष 2014 से ही शुरू हो गई थी। इस गांव के बाशिंदे और शोध छात्र रामबाबू तिवारी बताते हैं कि यहां चौपालों से शुरुआत हुई। बजरंगी आश्रम प्रकृति आश्रम में हर माह पानी की चौपाल होती है। कार्तिक पूर्णिमा पर हर साल देव सागर तालाब किनारे तालाब महोत्सव मनाया जाता है। वॉल पेंटिंग, सोशल मीडिया आदि की भी मदद ली जा रही है। पानी और पर्यावरण क्षेत्र में काम करने वालों को सम्मानित किया जाता है।
900 मिमी बारिश, 30 फीसदी बढ़ा उत्पादन
बांदा। बुंदेलखंड में हर साल 800 से 900 मिमी औसत बारिश होती है। यह काफी है। खेत में मेड़ और तालाब बनाकर इस पानी को रोक लिया जाए तो 30 फीसदी तक उत्पादन बढ़ा देखा गया है। बुंदेलखंड के प्रगतिशील किसान और राज्य किसान समृद्धि आयोग सदस्य प्रेम सिंह का कहना है कि खेत की मेड़ में पेड़ भी लगाए जाने चाहिए। इसका दूसरा फायदा यह है कि उपजाऊ मिटटी बारिश के पानी में नहीं बहेगी। भू जलस्तर भी बढ़ेगा। उदाहरण दिया कि बरबई गांव के किसान बृजपाल सिंह 60 बीघा के काश्तकार हैं। उन्होंने 30 बीघा में गेहूं मेड़बंदी वाले खेत में बोया। इस खेत के तालाब से तीन बार सिंचाई करनी पड़ी, जबकि शेष 30 बीघा में ट्यूबवेल से पांच बार पानी लगाना पड़ा। तालाब वाले खेत में 30 फीसदी उत्पादन ज्यादा हुआ। (संवाद)
इंसेट---पुराने तालाबों की टीम से कराएं जांच
बांदा। बुंदेलखंड में चल रही खेत तालाब योजना में अंगुलियां भी उठने लगी हैं। कार्यदायी संस्था पर कमीशन के भी आरोप हैं। समाजसेवी और आरटीआई एक्टिविस्ट आशीष सागर दीक्षित का कहना है कि वर्ष 2020-21 में बांदा में 1500 खेत तालाब खोदे गए थे। इस साल चित्रकूटधाम मंडल में सात हजार खेत तालाब का लक्ष्य है। बताया कि ठेकेदार से हुई बातचीत की रिकार्डिंग उनके पास है, जिसमें ठेकेदार ने प्रति तालाब 5 से 10 हजार रुपये कमीशन देने की बात कही है। भूमि संरक्षण विभाग जेई की रिपोर्ट के बाद ठेके दार से तालाब खुदवाता है। आशीष ने कहा कि मंडलायुक्त दिनेश कुमार सिंह खेत तालाब योजना में काफी जोर दे रहे, पर पूर्व में खोदे गए तालाबों की उन्हें टीम गठित कर जांच करानी चाहिए। वरना इस योजना का पैसा भी पानी के नाम पर पानी में जाएगा। (संवाद)
बारिश की पानी रोकने से गहराई तक नमी भी बढ़ी
बांदा। अधांव गांव में खेत में पानी ठहरने से गहराई तक नमी भी बढ़ रही और इसका फायदा किसानों को फसल उत्पादन में वृद्धि के रूप में भी मिल रहा है। आमतौर पर यहां किसान एक ही फसल पैदा कर पाते थे, लेकिन जब से खेतों में मेड़बंदी करके बारिश का पानी रोकने की किसानों ने कवायद शुरू की है, वहां अब अब दो फसलों की पैदावार भी होने लगीं हैं। मुख्य फसल गेहूं की है। महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) से भी खेतों में मेड़बंदी का प्रावधान है। भूमि संरक्षण विभाग और ग्राम पंचायतें मनरेगा से मेड़बंदी कराते हैं। इसके लिए शासन हर साल बजट भी देता है। (संवाद)
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