नदी पर अवैध पुल और तटों पर मशीनों और वाहनों की धमाचौकड़ी से वन क्षेत्र अशांत हो गया है। यहां बसेरा करने वाले पक्षी पलायन कर गए हैं। वन क्षेत्र में बनाए गए अवैध पुल और मशीनों के प्रयोग का वन विभाग का विरोध ठंडे बस्ते में डाल दिया गया।
नदी की रेत और पानी में नजर आने वाले सारस पक्षी अब नदारद हैं। एनजीटी, सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के आदेशों को यहां खुली चुनौती मिल रही है। केन नदी में नरैनी क्षेत्र से लेकर सदर तहसील तक कई स्थानों पर बालू कारोबारियों ने अवैध रूप से पुल बना रखे हैं। इनसे बालू भरे ट्रक गुजरते हैं।
हालांकि काफी विरोध और हाय-तौबा के बाद प्रशासन और पुलिस ने कुछ पुल तुड़वा दिए हैं, लेकिन अभी भी सदर तहसील के पथरी गांव के पास केन नदी मेें बनाया गया बालू कारोबारियों का पुल बरकरार है। इसमें रात-दिन बालू के वाहनों की धमाचौकड़ी है।
उधर, नदी के दोनों ओर तट पर पोकलैंड और लिफ्टर जैसी मशीनों का रात-दिन हो रहे इस्तेमाल से यह इलाका अशांत हो गया है। इस शोरगुल से नदी में बसेरा लेने वाले तमाम दुर्लभ प्रजाति के पक्षी और रेत में रहने वाले सारस भाग खड़े हुए हैं।
हैरत की बात यह है कि वन विभाग ने पिछले माह उप जिलाधिकारी सदर को अपनी लिखित रिपोर्ट में बताया था कि केन नदी में बना अस्थायी पुल का रास्ता वन विभाग की आराजी नंबर-4 (रकबा 47.553 हेक्टेअर) में 100 मीटर की परिधि में है।
वन विभाग अधिकारियों ने अपनी जांच रिपोर्ट में स्पष्ट कहा है कि इस पुल के निकट सारस पक्षी का प्राकृतिक वास भी है। जांच के समय कुछ सारस नजर भी आए, लेकिन वाहनों और मशीनों की कोलाहल से यह यहां बसेरा नहीं ले पा रहे। वन विभाग की यह रिपोर्ट राजस्व और खनिज विभाग की फाइलों में धूल खा रही है। पुल ज्यों का त्यों बरकरार है।
प्रवास सोसायटी के आशीष सागर ने एनजीटी, सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के आदेशों को मिल रही खुली चुनौती के मामले में प्रशासन की खामोशी पर हैरत जताई है।