आलू का ढेर लगाए बैठा किसान रमेश।
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बांदा। आलू भी नहीं रह पाया चालू। नोटबंदी की इस पर पड़ी चोट। आलू का थोक व्यापार चौपट है। चित्रकूटधाम मंडल के इकलौते कोल्ड स्टोरेज मेें भरा पड़ा आलू किसान निकालने नहीं आ रहे। मंडी में आवक 50 फीसदी घटने से दाम भी औंधे मुंह गिरे हैं। सबसे दुर्दिन पुराने आलू के हैं। इन्हें कोई नहीं पूछ रहा। सीजन में कमाई का सपना संजोकर पुराने आलू का भंडार कर लेने वाले आढ़ती माथा पीट रहे हैं। आलू किसानों के चेहरे पर भी मायूसी है। कोल्ड स्टोरेज में रखा आलू उठाने किसान नहीं आ रहे।
चित्रकूटधाम मंडल में बांदा आलू की बड़ी मंडी है। नोटबंदी के पूर्व यहां लगभग 800 कुंतल प्रतिदिन आलू की आवक थी। फर्रुखाबाद, सिरसागंज, कन्नौज, कानपुर, फतेहपुर, बिंदकी सहित बांदा के ग्रामीण इलाकों से भी आलू आता है। आढ़ती बताते हैं कि नोटबंदी के बाद आलू का कारोबार चालू नहीं सका। आवक 800 से घटकर मात्र 400 कुंतल पर आ गई। खपत घटी तो भाव भी गिरे। नवंबर की शुरुआत में 700 रुपये कुंतल बिकने वाला आलू अब 200 कुंतल होने पर भी खरीददार ढूंढे नहीं मिल रहे। थोक व्यापारी मंजूर अहमद ने कहा कि बैंक से हफ्ते में मात्र 24000 रुपये मिल रहे हैं। दूसरी तरफ किसान उधारी नहीं दे रहे हैं।
ऐसे में दुकानदारी चौपट है। बीते सीजन की अपेक्षा अबकी आधी मात्रा में भी आलू नहीं आ रहा। आढ़ती शब्बीर अहमद ने बताया कि उनके पास डंप आलू 80 रुपये बोरी (50 किलो) के भाव भी नहीं बिक रहा। आलू व्यापारी अर्जुनदास और अशोक कुमार ने बताया कि नोटबंदी के पहले उनकी आढ़त में रोजाना तकरीबन 400 कुंतल आलू आता था। अब घटकर डेढ़-दो सौ कुंतल रहे गया है। उधर, पुराने आलू का स्टाक किए आढ़ती अजमेरी, सिद्धू, शब्बन, सादिक आदि ने बताया कि पुराना आलू कोई नहीं पूछ रहा। लगभग दो-ढाई हजार कुंतल आलू कोल्ड स्टोरेज में रखा हुआ है। एक माह के अंदर यह नहीं बिक पाया तो फेंकना पड़ेगा। नोटबंदी से नए आलू के भाव भी गिरे हैं। यह 4000 रुपये से घटकर 6-7 सौ रुपये प्रति कुंतल आ गया है।