अब बालू और महंगी हो सकती है क्योंकि इसके कारोबार में बाहरी लोगों की सेंध मारी रोकने के लिए स्थानीय बालू व्यवसायियों ने खनिज विभाग की चांदी कर दी है। महत्वपूर्ण खदानों के पट्टे 22 गुना महंगे लेकर सरकार तक रसूख रखने वाले बालू कारोबारियों को तगड़ी मात दी।
प्रतिस्पर्धा के इस खेल में खनिज विभाग का जमकर फायदा हुआ। जिन खदानों को वह सिर्फ 75 लाख में दे रहा था उनमें उसे 16 करोड़ से ज्यादा रुपये हासिल हो गए। जनपद की यमुना, केन और बागै नदियों की 15 बालू खदानों के लिए खनिज विभाग ने पिछले माह टेंडर जारी किए थे।
प्रदेश के विभिन्न जनपदों के धुरधंर बालू कारोबारियों समेत दिल्ली की डायमिक रियलकान और गोल्ड क्रस्ट लाइनिंग जैसी कंपनियों ने भी बांदा के इस ‘लाला सोना’ से कमाई के लिए टेंडर डाले, लेकिन इस व्यवसाय में दशकों से जुटे स्थानीय बालू कारोबारियों ने अपना वर्चस्व बरकरार रखने और बाहरी लोगों की घुसपैठ रोकने के लिए जमकर दरियादिली दिखाई।
बाहरियों को मात देने के लिए खदानों की दरें 22 गुना ज्यादा बढ़ाकर टेंडर डाले। नतीजे में प्रमुख खदानें उन्हीं के खाते में आई हैं। सबसे ज्यादा मारामारी सादीमदनपुर गांव में यमुना नदी की चार खदानों पर रही। खनिज विभाग ने इस गांव की खदानों को चार खंडों में बांटकर अलग-अलग टेंडर आमंत्रित किए थे। इनके लिए 18 टेंडर डाले गए।
सबसे बड़ी 105 एकड़ वाली खदान के लिए खनिज विभाग ने वार्षिक पट्टा राशि (राजस्व) 33.60 लाख रुपये निर्धारित किया था। इस खदान के लिए चार टेंडर आए। इनमें दो दिल्ली की कंपनियां भी थीं, लेकिन इन सभी को मात देते हुए यहां के बालू कारोबारी सीरजध्वज सिंह ने 7.60 करोड़ रुपये का टेंडर डालकर खदान अपने नाम करा ली।
उन्होंने निर्धारित राजस्व से सात करोड़ 26 लाख 40 हजार रुपये ज्यादा का ऑफर दिया है। खंड-2 खदान (70 एकड़) के लिए खनिज विभाग ने 22.40 लाख वार्षिक टैक्स निर्धारित किया था। इस खदान के लिए भी पांच टेंडर आए।
खास बात यह है कि इस खंड का पट्टा हासिल करने के लिए प्रदेश के खनिज मंत्री गायत्री प्रजापति के गृह जनपद अमेठी से आए पिता-पुत्र हीरालाल प्रजापति और मोतीलाल प्रजापति ने भी टेंडर डाले थे, लेकिन स्थानीय बालू व्यवसायी युवराज सिंह ने इस खदान के लिए तीन अन्य पछाड़कर सबसे ज्यादा लगभग 19 गुना अधिक अधिकतम 4.20 करोड़ रुपये का टेंडर डाला है।
इसी तरह खंड-3 (16 एकड़) खदान में भी इसी खानदान ने 1.20 करोड़ (यानि 23 गुना ज्यादा) का टेंडर डालकर तीन अन्य टेंडर दाताओं को पीछे कर दिया। चौथी खदान खंड-4 पर अजय राज द्विवेदी अव्वल रहे। 46 एकड़ की इस खदान के लिए खनिज विभाग ने 14.72 लाख वार्षिक टैक्स निर्धारित किया। इस खदान के लिए पांच टेंडर आए।
सबसे ज्यादा तीन करोड़ 26 हजार 100 रुपये (22 गुना अधिक) का टेंडर अजयराज द्विवेदी का रहा। कुल मिलाकर सादीमदनपुर की चारों खदानों में 75.84 लाख के मुकाबले 16.26 करोड़ रुपये के टेंडर डाले गए हैं।
उल्लेखनीय है कि खदानों के पट्टे 22 गुना तक महंगे उठने पर यह आशंका भी जताई जा रही है कि एक तरफ जहां बालू महंगी होगी वहीं अवैध खनन भी ज्यादा होगा। जानकारों का कहना है कि कई खदानों में उतनी कीमत की बालू नहीं है जितनी टेंडर में बोली लगाई गई है। ऐसे में ठेकेदार घाटे से बचने को अवैध खनन का सहारा लेंगे। साथ ही बालू के दाम बढ़ेंगे। इसका सीधा असर आम उपभोक्ता पर पड़ेगा।
नौ पर ही रही मारामारी, छह खदानों के टेंडर खाली
खनिज विभाग ने कुल 15 खदानों के लिए टेंडर आमंत्रित किए थे, लेकिन बालू कारोबारियों ने सिर्फ नौ खदानों पर ही ज्यादा दिलचस्पी दिखाई। नतीजे में छह खदानों के टेंडर नहीं हो सके। सिर्फ सादीमदनपुर और मरका खादर गांव के ही खदानों के टेंडर ज्यादा आए।
इसके अलावा सिंधनकलां और लोहरा खदान का भी टेंडर हो जाना बताया गया है। अन्य खदानाें के लिए निर्धारित न्यूनतम तीन टेंडर न आने पर उनका पट्टा फिलहाल टल गया है। पर्याप्त संख्या में टेंडर आने पर ही यहां पट्टे होंगे। खनिज अधिकारी हवलदार सिंह ने बताया कि चार खदानों में निर्धारित संख्या के मुताबिक टेंडर न आने से उनके पट्टे नहीं किए गए हैं।
गोपनीयता के नाम पर हो सकता है ‘खेल’
टेंडर खुलने के बाद खनिज विभाग और जिला प्रशासन इन्हें सार्वजनिक नहीं कर रहा है। टेंडर प्रक्रिया में प्रदेश सरकार के पारदर्शिता के आदेश यहां बेमाने साबित हो रहे हैं। उधर, यह आशंका जताई जा रही है कि टेंडर में मात खाए रसूख वाले लोग शासन स्तर पर कुछ खेल अपने हक में खेल सकते है।
टेंडर की जानकारी मांगने पर जिला खनिज अधिकारी हवलदार सिंह यादव की दलील है कि टेंडर फाइल जिलाधिकारी को भेज दी गई है। वह अपनी संस्तुति करके शासन को भेजेंगे। बकौल खनिज अधिकारी जब तक शासन की स्वीकृति नहीं मिलती जब तक खदानों और पट्टे धारकों का नाम गोपनीय रखा जाता है।