बांदा। बुंदेलखंड का तापमान मई की शुरुआत से ही 44 डिग्री के आसपास चल रहा है। ऐसे में नाम वापसी के बाद अब सियासी पारे के भी चढ़ने आसार हैं। तस्वीर साफ होने के बाद प्रमुख लड़ाकों ने राहत की सांस ली है।
यूं तो चुनाव की अधिसूचना जारी हुए करीब दो माह हो गए, लेकिन पहले टिकट का संशय फिर कटने व बदलने का झंझट उस पर बागी तेवरों से लगभग तीनों ही प्रमुख सियासी दल इस कदर परेशान थे कि न तो प्रचार तेजी पकड़ रहा था और न ही घोषित प्रत्याशी अपने-अपने आलाकमान को भांप पा रहे थे। अब जब तस्वीर एकदम साफ हो गई है तो प्रमुख लड़ाकों ने राहत की सांस ली है।
पहले बात करते हैं भाजपा प्रत्याशी आरके पटेल की तो इनका नाम पार्टी हाईकमान ने वैसे तो दूसरी सूची में ही जारी कर दिया था और आरके पटेल भी पार्टी की हैट्रिक के लिए आश्वस्त दिख रहे थे। जैसे ही नामांकन प्रक्रिया शुरू हुई और पार्टी के पूर्व सांसद भैरो प्रसाद मिश्र ने पर्चा खरीदा तो भाजपा के अंदरखाने हलचल मच गई।
कोई भैरो को बागी तो कोई समाजवादी पार्टी का प्रत्याशी बताकर चर्चाओं का बाजार गर्म किए था। ऐसे में पार्टी और घोषित प्रत्याशी दोनों की चिंता बढ़ना लाजिमी था, लिहाजा प्रचार कम और भैरो को मनाने की कवायद अधिक की गई। आखिर में सोमवार को नाम वापसी तक भैरो ने किसी तरह के तेवर न दिखाकर भाजपा की चिंता को ठंडा कर दिया है।
इसी तरह गठबंधन ने जैसे ही शिवशंकर को सपा से उम्मीदवार तय किया था तो उनकी तबीयत इस कदर बिगड़ी कि उन्हें लखनऊ में भर्ती होना पड़ा। अस्पताल से लौटे तो सपाइयों में बीमारी के चलते टिकट बदलने की चर्चा तेज हो गई। लिहाजा शिवशंकर प्रचार की चिंता छोड़कर टिकट को मजबूती से पकड़े रहने में अधिक व्यस्त रहे। नामांकन के अंतिम क्षणों तक तो कई सपा के दिग्गज नेताओं के नाम भी शिवशंकर के स्थान पर चर्चा में आने लगे।
ऐसे में मजबूरन शिवशंकर को अपनी पत्नी कृष्णा को साथ में लेकर मैदान में कूदना पड़ा और दोनों ने पर्चा भरा। जब नाम वापसी की प्रक्रिया पूरी हो गई तो कृष्णा की दावेदारी पूरी तरह मजबूत हुई और गठबंधन ने अब चुनाव प्रचार तेज कर दिया है।
वहीं, इन सबके के बीच सबसे देर से मैदान में कूदे बसपा के प्रत्याशी मयंक द्विवेदी भी भाजपा और गठबंधन दोनों दलों पर टकटकी लगाए हुए थे। बसपाइयों का कहना था कि बिना विरोधियों की तस्वीर साफ हुए रणनीति बनाना मुश्किल था। अब दो प्रत्याशी एक जाति से हैं तो उनके लिए भी ताकत झोंकने की रणनीति बनाने का रास्ता साफ हो गया है। नाम वापसी के बाद 20 मई के लिए बचे इन में तीनों ही प्रमुख दलों का न सिर्फ प्रचार जोर पकड़ेगा बल्कि साथ-साथ ही मौसम का पारा भी तेजी से चढ़ेगा।