बांदा। बुंदेलखंड में सूखे में पानी के साथ दूध की धारा भी सूख गई। पशुपालन और उनसे परिवार पालना यहां का पुराना पेशा और शौक था। लेकिन अब यह घाटे का सौदा बन गया है। जहां दूध की धार बहने की मिसाल दी जाती थी वहां दूध की बूंदे में भी नहीं निकल रहीं। एक मवेशी पर हर रोज ढाई सौ रुपये खर्च आ रहा है। दूध सिर्फ 100 से 200 रुपये का बिक रहा है। गेहूं का भूसा महंगा होने से पशुपालक कूड़े में फेंकने या जलाकर धुआं करने वाला मटर, सरसों से मवेशियों का पेट भर रहे हैं।
बुंदेलखंड में कृषि के बाद पशुपालन दूसरा सबसे बड़ा रोजी-रोटी का जरिया है। पशु पालन विभाग के मुताबिक चित्रकूटधाम मंडल की दो तिहाई आबादी दूध व्यवसाय से जुड़ी है। बुंदेलखंड पैकेज में पशुपालन व्यवस्था सुधारने के लिए 100 करोड़ रुपये दिए गए थे। इसके अलावा प्रदेश सरकार ने चित्रकूटधाम मंडल को चार करोड़ रुपये और दिए हैं। लेकिन यह बजट भी यहां का पशु और दूध व्यवसाय बचा नहीं पाया।
औसतन एक पशु पर एक दिन में 10 किलो भूसा, दो किलो दाना व खली की खपत होती है। इसकी लागत 180 रुपये है। मेहनत अलग है। इस समय सूखे की वजह से मवेशी को भरपेट चारा-भूसा और पौष्टिक अहार न मिलने से 5 लीटर दूध देने वाली भैंस सिर्फ डेढ़ या दो लीटर दूध दे रही है। यह 80 या 90 रुपये का होता है। गेहूं के भूसा की कीमत एक हजार रुपये कुंतल है। पर्याप्त कमाई न होने की वजह से पशुपालन व्यवसाय खत्म हो रहा है। पशुपालक खर्च चलाने के लिए मवेशी बेच रहे हैं।