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बांदाः खुशी को मां के आंचल की नहीं मिल रही ‘खुशी’

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बांदा में महज छह वर्ष की लाडली बेटी खुशी करीब एक पखवारे से मां की नजरों से ओझल रहे तो मां और बेटी पर क्या बीतेगी? यह दुश्वारी तब जब मां-बेटी के बीच महज चंद कदम की दूरी हो। इसकी बानगी बांदा जिला अस्पताल में स्टाफ नर्स पद पर तैनात प्रीति पाल हैं। उन्हें अस्पताल परिसर में ही विभागीय आवास मिला है।
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उनकी छह वर्ष की इकलौती बेटी खुशी है। 20 अप्रैल से जिला अस्पताल में कोरोना वार्ड में ड्यूटी लगने के बाद मां-बेटी के बीच पाला खिंच गया। बेटी के प्रति प्रीति पाल ‘प्रीति’ दर्शाने में मजबूर हो गईं। 17 दिनों से मां अपनी लाडली को गले से नहीं लगा पाई। बच्ची मासूम है पर समझदार है। मां को बराबर मिस कर रही है। अलबत्ता दोनों के बीच फोन पर रोज बात होती है।
प्रीति बताती हैं कि बेटी खुशी की कॉल आते ही उसका पहला जुमला यही होता है- ‘मां! घर कब आओगी। घर में मुझ्ेो अकेले अच्छा नहीं लग रहा। प्लीज मां जल्दी आओ।’। प्रीति बताती हैं कि बेटी को रोजाना रटारटाया यही भरोसा दिलाती हैं कि- बेटा जल्द आऊंगी। देश के प्रति भी कुछ जिम्मेदारियां हैं उन्हें निभा रही हैं। बेटी को उसकी नानी मीरा सहारा दिए हैं।
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