बांदा। प्रदेश और केंद्र सरकार कोविड अस्पतालों में भर्ती संक्रमितों को बेहतर से बेहतर इलाज और साफ सफाई समेत अन्य सुविधाएं मुहैया कराने के लिए जी-जान से रातदिन जुटी है, लेकिन इन अस्पतालों की हकीकत सरकारी प्रयासों से कोसों दूर है। सरकार इन अस्पतालों के लिए खजाने का मुंह भी पूरी तरह से खोले हुए, पर इसके बावजूद सुविधाओं के नाम पर कोविड मरीजों को जर्जर पलंग, फटे गद्दे और मैली चादरों संग इलाज कराना पड़ रहा है।
अस्पताल की साफ-सफाई पर भी भारी भरकम बजट खर्च किया जा रहा, लेकिन यहां के कोविड अस्पतालों में इसके उलट हो रहा है। यहां मरीजों की सेहत से खिलवाड़ किया जा रहा है। मरीजों को न तो बेहतर सुविधाएं मिल रही हैं और न ही साफ सफाई का ध्यान रखा जा रहा है। शौचालयों और वार्डों में गंदगी का अंबार लगा रहता है।
कोविड वार्डों में भर्ती मरीजों को सुविधाओं के नाम पर फटे गद्दे और जर्जर पलंग दिए गए हैं। भीषण गर्मी में भी पंखे (सीलिंग फैन) न चलने से भर्ती मरीजों को और भी दुश्वारियों का सामना करना पड़ रहा है। किसी तरह से दिन गुजारने के बाद रात भी पसीने से तरबतर होकर काटने को मजबूर हैं।
कोरोना संक्रमण की पुष्टि होने के बाद संक्रमित मरीजों को कोविड अस्पतालों में भर्ती कराया जाता है। बिना लक्षणों वाले पॉजिटिव मरीज एल-1 में और सिम्टम व गंभीर मरीजों को एल-2 अस्पताल में दाखिल किया जाता है।
करीब 10 से 15 दिनों तक मरीजों को यहां रखा जाता है। निगेटिव रिपोर्ट आने पर उन्हें घर भेज दिया जाता है। एल-1 कोविड अस्पताल/नरैनी सीएचसी और एल-2 कोविड अस्पताल/राजकीय एलोपैथिक मेडिकल कालेज में भर्ती कोरोना मरीज वार्डों में फैली गंदगी से दहशत में हैं। उन्हें कोरोना के अलावा अन्य बीमारियों की चपेट में आने की चिंता सता रही है।
एल-वन में भर्ती होते मामूली लक्षण वाले
एल-वन कोविड अस्पताल/सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र, नरैनी में मामूली लक्षण वाले कोरोना मरीजों को क्वारंटीन किया जाता है। यहां लगभग 40 मरीज भर्ती हैं, पर वार्डों के हालात बदतर हैं, जो यहां भर्ती मरीजों की खींची तस्वीरें बयां कर रही हैं।
फर्श पर कई-कई दिन झाड़ूू नहीं लगती। सबसे बुरा हाल बिस्तरों का है। पलंग पर बिछाने के लिए मरीजों को चादर तक नहीं दी जाती। वे घरों से चादर ला रहे हैं। दिन-रात फटे गद्दों पर बिता रहे हैं। जंग लगे पलंग जर्जर हैं। पंखे भी नहीं चलते। खाना-नाश्ता देने का कोई समय नहीं है। मरीजों का आरोप है कि खाना जो मिलता है, लेकिन काफी घटिया होता है।
एल-टू अस्पताल में भर्ती हैं 42 संक्रमित
एल-टू कोविड अस्पताल/राजकीय एलोपैथिक मेडिकल कालेज में कोरोना के गंभीर मरीज भर्ती किए जाते हैं। यहां लगभग 42 कोरोना संक्रमित मरीज भर्ती हैं। इस अस्पताल में एक आईसीयू और सात एचडीयू वार्ड हैं। यहां भी आइसोलेशन वार्ड का हाल बेहाल है।
पीपीई किट से लैस डाक्टर और कर्मचारी दिन में एक या दो बार ही वार्ड में जाते हैं। इसके बाद मरीज भगवान भरोसे होते हैं। हरेक वार्ड में वॉश बेसिन और शौचालय गंदे हैं। कई-कई दिन बाद चादर दिया जाता है। सैनिटाइजेशन के नाम पर सिर्फ रस्म अदायगी होती है। हालांकि, फर्श पर गंदगी की शिकायत यहां नहीं मिली।
बिना चादर, फटे गद्दों पर मरीज लेट रहे
गायत्री नगर का 27 वर्षीय युवक एल-1 अस्पताल/नरैनी सीएचसी में भर्ती है। अमर उजाला को फोन पर बताया कि उसके वार्ड में लगभग 14 लोग क्वारंटीन हैं। उसे भर्ती हुए सात दिन हो गए, लेकिन अब तक चादर नहीं दी गई।
रेक्सीन के फटे गद्दों पर मरीज लेटने को मजबूर हैं। पलंग के आसपास झाड़ूू तक नहीं लगाई जाती है, बाथरूम बेहद गंदा है। दुर्गंध से सांस लेना दूभर है। खाने में लगातार सुबह और शाम सिर्फ कद्दू की सब्जी और अधपकी रोटी मिल रही है। आरोप लगाया कि कोई सुविधा नहीं दी जा रही है।
इंजेक्शन लगाने कोई नहीं आया तो खुद लगाया---
तिंदवारी क्षेत्र के कोरोना संक्रमित 48 वर्षीय ग्राम पंचायत अधिकारी राजकीय मेडिकल कालेज में भर्ती हैं। उन्होंने भी आइसोलेशन वार्ड के हाल की पोल खोली। उन्होंने बताया कि भर्ती वाले दिन उन्हें कोई देखने तक नहीं आया।
फेफड़ों में संक्रमण और शुगर के मरीज हैं। कानपुर के एक बड़े निजी अस्पताल में इलाज चल रहा है। उन्होंने इंसुलिन इंजेक्शन लगाने का अनुरोध किया था, पर कोई नहीं आया। आखिरकार उन्होंने खुद इंसुलिन का इंजेक्शन लगाया। गंदगी से यहां बुरा हाल है। शौचालय से सड़ांध उठ रही है। कोई हालचाल लेने नहीं आता।
मेडिकल कॉलेज के आइसोलेशन वार्ड में मरीजों को सुविधा देने का पूरा प्रयास रहता है। सुबह और शाम स्वीपर वार्डों की सफाई करते हैं। उन्हें हिदायत भी दे रखी गई है कि सभी वार्ड के शौचालय साफ रहें। फिलहाल उन्हें अब तक कोई शिकायत नहीं मिली है। शिकायत मिलेगी तो जरूर कार्रवाई करेंगे। मरीज के जीवन से खिलवाड़ नहीं होने देंगे।-डॉक्टर मुकेश कुमार यादव, प्रिंसिपल, राजकीय मेडिकल कालेज, बांदा।
गंदगी फैलाने के लिए मरीज खुद जिम्मेदार हैं। तमाम मरीज चोरी छिपे गुटका खाकर थूक देते हैं। दिन में दो से तीन बार वार्डों की सफाई कराई जाती है। फिनायल से पोंछा लगता है। मरीज ही खुद चादर अच्छे से नहीं रखते। मरीज की मंशा है कि उन्हें यहां न रखा जाए, घर भेज दिया जाए। इसी वजह से फोटो खींचकर वायरल कर रहे हैं।-डाक्टर बीएस राजपूत, चिकित्साधिकारी, एल-वन, सीएचसी, नरैनी।
Kovid hospitals in bad condition, patients suffering- फोटो : BANDA