भारत में भले ही खेती घाटे का सौदा बन गई हो लेकिन यहां के तौर-तरीके अपना विदेशों में किसानी शानदार आमदनी का जरिया बन गई है। खेती मेें माहिर विदेशी किसानों का मानना है कि भारत को इतना कृषि ज्ञान है कि वह इस क्षेत्र में विश्व गुरु बन सकता है, बशर्ते यहां की सरकार खेती के इस ज्ञान का संज्ञान ले लें।
बेल्जियम में सरकार के सीनियर कृषि सलाहकार जोहन डी हलस्टर इन दिनों भारत के दौरे पर हैं। वह रविवार को यहां बड़ोखर खुर्द गांव स्थित प्रगतिशील किसान प्रेम सिंह के मानवीय शिक्षण संस्थान/कृषि फार्म में आए हुए थे। यहीं उनसे ‘अमर उजाला’ की खास बातचीत हुई।
उन्होंने कहा कि वे 36 साल से बेल्जियम के छोटे से गांव श्रीक में अपनी पत्नी हृेट के साथ 25 बीघे जमीन में सब्जी की खेती व बागवानी करते हैं। फिलास्फी और एकॉनामिक्स से ग्रेजुशन करने के बाद उन्होंने खेती करने की ठानी। इससे उन्हें हर माह करीब 10 लाख रुपये की आमदनी हो रही है। अपने खेतों की पैदावार खुद दुकान में सजाते हैं। लागत का आगणन कर खुद रेट निर्धारित करते हैं।
उन्होंने कहा कि भारत और खासकर बुंदेलखंड में रासायनिक खेती यहां के किसानों को तबाह किए जा रही है। उन्होंने भारतीय किसानों को सलाह दी कि वह 40 साल पहले लौटें तो खुशहाली भी लौट आएगी। जैविक खेती फिर अपनाएं। इसमेें लागत शून्य और उत्पादन अच्छा होता है। अमेरिका व यूरोप में लोग बेस्वाद व हानिकारक भोजन करते हैं। स्वास्थ्य पर आधा से ज्यादा पैस खर्च हो जाता है।
वहीं भारत में आज भी लजीज और स्वास्थ्यवर्द्धक भोजन की भरमार है। उन्होंने कहा कि गाय को सिर्फ दुधारू पशु न समझें, बल्कि उसके गोबर से तैयार खाद खेती का कायाकल्प कर देगी। यहां के किसानों को सलाह दी कि वह खुद बीज, खाद व बाजार अपने खेतों और घर पर तैयार करें तो पलायन का सिलसिला थम जाएगा और खुशहाली लौटेगी। मानवीय शिक्षण संस्थान अध्यक्ष प्रेम सिंह वे इस जैविक विधा को खेत-खेत में प्रचारित करेंगे।