महिलाएं, युवतियां और किशोरियां सिरों पर कजलिया लिए सुबह से ही जत्थों में विसर्जन स्थल वाले तालाबों की ओर चल पड़ीं। बुंदेली और कजलिया गीत गाती रहीं। छाबी तालाब के घाट पर कजलियों के विसर्जन की परंपरा निभाई गई। यह कजलियां घरों में बोई गई थीं। मान्यता है कि कजलिया घर में रखने से खुशहाली आती है। विसर्जन के दौरान छाबी तालाब में इर्द-गिर्द मेला जैसा नजारा रहा। दोपहर बाद नवाब टैंक में मेला लगा। आसपास के गांवों से आए महिला-पुरुषों ने खरीददारी की।
दंगल में स्थानीय और बाहरी पहलवानों ने दांव-पेंच दिखाए। आयोजन समिति ने पहलवानों को पुरस्कृत किया। जनपद के बबेरू, नरैनी, अतर्रा, मटौंध, खप्टिहाकलां, जसपुरा, पैलानी, तिंदवारी, बेंदाघाट, करतल, महुआ, खुरहंड, में भी कजलिया पर्व पूरे हर्षोल्लास और परंपराओं के बीच मनाया गया। कालिंजर। परंपरा के मुताबिक रक्षाबंधन के एक दिन बाद मंगलवार को कजली मेला लगा। इसमें मुख्य आकर्षण शोभा यात्रा रही।
आल्हा-ऊदल, पृथ्वीराज, बौना चोर, पृथ्वीराज चौहान, चंद्रावल का डोला, ऊंट पर सवार सैय्यद चाचा, बहुरूपिया आदि की झांकियां और विभिन्न स्वरूपों में सजे-धजे बालक-बालिकाएं तथा हाथी-घोड़े शामिल रहे। विभिन्न वेषभूषा में चल रहे कलाकारों ने भी दर्शकों को ध्यान आकृष्ट कराया। मेला का उद्घाटन विधायक राजकरन कबीर ने फीता काट कर किया। जिला पंचायत पूर्व अध्यक्ष महेंद्र सिंह वर्मा, राकेश मिश्रा, दिलीप राजपूत, उमेश मिश्रा, कमलाकांत द्विवेदी, मेला कमेटी प्रबंधक सरजू कुशवाहा, कोषाध्यक्ष शंकरलाल कुशवाहा आदि उपस्थित रहे। अथइया दाई में कजली मेला लगा।