मटौंध। सूखे में लोगों का सहारा बनने वाले अति प्राचीन व धार्मिक महत्व के कुएं प्रशासन की अनदेखी से अपना अस्तित्व खो चुके हैं। पंचायती राज विभाग गांव-गांव हैंडपंपों में पशुओं को पानी पीने के लिए चरही बनाने का ढिंढोरा पीट रहा है, पर यहां एक भी चरही नहीं बनीं। सूखे व गर्मी में प्यास से इंसान व जानवर बेदम हो रहे हैं।
करीब एक दर्जन कुओं का अस्तित्व मिटने की कगार पर है। खुमान कुआं, हरिशन थोक, खाड़े कुआं, चांदन थोक, सुखुवा कुआं, आचरन थोक, पेरिया कुआं, चुनिया दाई का कुआं, घुरहा थोक कुआं, ख्याम कुआं, चुनिया दाई का कुआं (घोरहा थोक), बाबा कुआं, कामता कुआं, गिरधारी कुआं, कलार दीवाला कुआं, सिंघइया कुआं, राजनश्री कुआं, बिहारी कुआं, फुट्टा कुआं (बैबे थोक) साठिया कुआं (60 फीट गहरे) हैं।
बैबे थोक मोहल्ले की बुजुर्ग महिला अंशु देवी रैकवार के मुताबिक 80 साल की उम्र ने कभी इन कुओं को सूखते नहीं देखा। दो दशक पूर्व तक बैलों से चरसा चलाकर इन कुओं से पानी खींचा जाता था। चरही भरी जातीं थीं। वंशी कुआं व बाबा कुआं में आज भी चरही के अवशेष हैं। अब यह सब कुएं कचरे से पटे पड़े हैं।
गांव के प्रेम मिश्रा और संजय मिश्रा अपने निजी बोर से लोगों व मवेशियों की प्यास बुझा रहे हैं। लोग सुबह से साइकिल, टैंपों व बैलगाड़ी में यहां से पानी लादकर ले जाते हैं। मवेशियों के समक्ष पानी की बड़ी समस्या है। कस्बा व क्षेत्र में हर रोज चार-पांच मवेशी प्यास व भूख से दम तोड़ रहे हैं। शनिवार को कंधी पुरवा व झिंगा खोड़ के बीच तीन मवेशी मृत मिले।