जिला पंचायत अध्यक्ष निर्मला सिंह को सुप्रीम कोर्ट से राहत नहीं मिली। 21 सदस्यों द्वारा पारित किए गए अविश्वास प्रस्ताव के विरुद्ध अध्यक्ष द्वारा दायर की गई विशेष अनुमति याचिका को सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया है। अध्यक्ष ने अधिवक्ता के माध्यम से इस आधार पर स्थगन आदेश प्राप्त किया था कि अविश्वास प्रस्ताव लाने की अवधि दो वर्ष है। लेकिन अपने इस दावे को वह सुप्रीम कोर्ट में कानूनी तौर पर साबित नहीं कर सकीं।
सपा की जिला पंचायत अध्यक्ष के विरुद्ध 28 दिसंबर को 16 सदस्यों ने अविश्वास प्रस्ताव की नोटिस दी थी। 23 जनवरी को इस प्रस्ताव पर बैठक हुई। 30 में से 21 जिला पंचायत सदस्यों ने अविश्वास प्रस्ताव के पक्ष में वोट डाले। इस पर अगले ही दिन अध्यक्ष ने सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका दायर कर दी। सुप्रीम कोर्ट ने अविश्वास प्रस्ताव संबंधी अग्रिम कार्रवाई पर रोक लगा दी और 5 फरवरी सुनवाई के लिए तिथि निर्धारित की थी।
सोमवार (5 फरवरी) को मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति दीपक मिश्रा और न्यायाधीश न्यायमूर्ति डीवाई चंद्रचूड़ तथा न्यायमूर्ति एएम खानविल्कर ने सुनवाई की। प्रदेश सरकार की ओर से अपर महाधिवक्ता ऐश्वर्या भाटी और वरिष्ठ अधिवक्ता कमलेंद्र मिश्रा ने दलील दी कि अविश्वास प्रस्ताव की समय अवधि शासन ने घटाकर एक वर्ष कर दी थी। जबकि अध्यक्ष के अधिवक्ता दो वर्ष बता रहे थे। अधिवक्ता कमलेंद्र ने बताया कि मुख्य न्यायाधीश ने अध्यक्ष पद के अधिवक्ता से कहा कि दो साल संबंधी अपने दावे के साक्ष्य/अभिलेख पेश करें। इसके लिए मुख्य न्यायाधीश ने अध्यक्ष के अधिवक्ता को 15 मिनट की मोहलत भी दी। लेकिन अध्यक्ष पक्ष इसके सबूत नहीं पेश कर सका।
अधिवक्ता कमलेंद्र ने बताया कि मुख्य न्यायाधीश ने अध्यक्ष पक्ष पर 20 लाख जुर्माने की बात कही, लेकिन उनके अधिवक्ता के अनुरोध पर इसे वापस ले लिया। साथ ही अध्यक्ष की विशेष अनुमति याचिका खारिज कर दी।