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इस्लामी मुल्कों से भी ज्यादा कठिन है बुंदेलखंड का रोजा

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जरूरतमंद रोजदारों को रोजा इफ्तार के लिए इफ्तार किट तैयार करते अलीगंज के स्वयंसेवी। - फोटो : BANDA
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बांदा। बुंदेलखंड में रोजेदारों को जो तपिश सहन करनी पड़ती है, वह दुनिया के कई इस्लामी मुल्कों से कहीं ज्यादा है। यहां के रोजेदार सबसे ज्यादा तपिश और लंबे समय का रोजा रखकर माहे रमजान की कद्र कर रहे हैं। 40-42 डिग्री तापमान पर 15 घंटे की भूख प्यास बर्दाश्त कर रहे हैं।
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इस्लामी कैलेंडर का 9 वां महीना रमजान होता है। इस बार यह अप्रैल के आखिरी हफ्ते में शुरू हुआ और मई के आखिरी हफ्ते तक चलेगा। शनिवार (9 मई) को 15वें रोजे के साथ यह महीना आधा बीत जाएगा। उधर, अब दिन-ब-दिन तपिश बढ़ रही है। साथ ही रोजे का वक्त भी बढ़ रहा है। पिछले 15 दिनों में रोजे का वक्त लगभग 18 मिनट बढ़ चुका है।
पहला रोजा 14 घंटें 28 मिनट का था। अब 15वां रोजा 14 घंटें 47 मिनट का हो गया है। इसके साथ ही तापमान में भी इजाफा हो रहा है। 38 डिग्री के साथ शुरू हुआ रमजान अब 42 डिग्री तक पहुंच गया है। ऐसे में रोजेदारों को करीब 15 घंटे बिना एक बूंद पानी या दाना के रोजे की कठिन परीक्षा देनी पड़ रही है लेकिन उनके चेहरों पर शिकन नहीं है।
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मई में सऊदी अरब और ईराक जैसे रेगिस्तानी मुल्कों में भी इतनी तपिश नहीं जितनी बुंदेलखंड में है। सऊदी में 35 डिग्री के आसपास तापमान है। पाकिस्तान और ईरान में 32 डिग्री अधिकतम तापमान बताया गया है। ऐसे में 40 से 42 डिग्री तापमान में तप रहे बुंदेलखंड में रोजेदार यह फर्ज अदा कर रहे हैं।
आल इंडिया काजी बोर्ड के नायब सदर मौलाना मुमताज रब्बानी ने कहा कि रमजान का महीना सब्र और हमदर्दी का सबक देता है। रोजा पूरी तरह सिर्फ अल्लाह की रजा के लिए है। करीब 15 घंटा भूख-प्यास बर्दाश्त करने से सब्र की सीख मिलती है। साथ ही अक्सर भूख से दिन गुजार देने वाले गरीबों की परेशानी का अहसास होता है। इस महीने में जकात, फितरा और सतका अदा करने का अज्र (पुण्य) बहुत ज्यादा है। इससे गरीबों की मदद भी होती है। इस माह हर नेकी का सवाब 70 गुना ज्यादा मिलता है।

मौलाना मुमताज रब्बानी।- फोटो : BANDA

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