स्योढ़ा गांव के पास से गुजरता बालू का यह ओवरलोड ट्रक।
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बांदा। बुंदेलखंड में बालू का कारोबार बसपा सरकार में उस वक्त चमका, जब बांदा के बाशिंदे बाबूसिंह कुशवाहा खनिज मंत्री बने। उसी समय से बालू खदानों पर बड़े-बड़े माफियों की निगाहें गड़ गईं। सिंडीकेट भी तभी से वजूद में आया। सिंडीकेट वसूली का ठेका प्रदेश के बड़े नामवर लोगों के हाथों में रहा। बाबू सिंह कुशवाहा को हटाने के बाद कुछ दिन के लिए बसपा सरकार मेें खनिज मंत्रालय इंद्रजीत सरोज के हाथ में रहा। मंत्री बदलने पर खनन का पैटर्न नहीं बदला।
सपा सरकार में शुरू के कुछ दिन यह मंत्रालय मुख्यमंत्री ने अपने पास रखा। बाद में गायत्री प्रजापति खनिज मंत्री बना दिए गए। अभी ये ही खनिज मंत्री हैं। प्रदेश में सत्ता परिवर्तन के बाद भी बालू कारोबार के तौर-तरीकों में कोई परिवर्तन नहीं आया। सपा सरकार में यह और परवान चढ़ा।
सत्तारूढ़ दल के बड़े नेताओं से लेकर छुटभइया तक बालू की कमाई में जुटे रहे। यह सिलसिला अभी जारी है। बुंदेलखंड के सातों जिलों के डीएम, संबंधित क्षेत्रों के एसडीएम, खनिज अधिकारी और इलाकाई पुलिस की अवैध खनन में कानूनी या जिम्मेदारी या जवाबदेही है। ऐसे में सीबीआई इन्हें भी जांच के दायरे में ला सकती है।
2012 से अब तक बुंदेलखंड में एक दर्जन से ज्यादा डीएम रह चुके हैं। लगभग डेढ़ दर्जन खनिज अधिकारी आए गए। बालू की तमाम खदानें सत्तारूढ़ दलों के नेताओं के नजदीकियों या खानदानियों के नाम रही हैं। जांच के घेरे में ये भी आएंगे। फिलहाल सीबीआई जांच का आदेश होने से बालू माफिया और कारोबारियों में खलबली है।