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पर्दा की परंपरा तोड़कर बुंदेली युवतियों ने रचा इतिहास

Wed, 14 Dec 2016 11:48 PM IST
अमर उजाला ब्यूरो बांदा
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रोडवेज बस में यात्रियों को टिकट बनाती नवनियुक्त महिला कंडक्टर आरती सिंह। - फोटो : अमर उजाला
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 बांदा शहर के आवास विकास कालोनी की रहने वाली आरती सिंह बुधवार को बांदा डिपो की बस लेकर हमीरपुर गईं थीं। उसने पिछले वर्ष यहां जेएन कालेज से एमए (इतिहास) की परीक्षा उत्तीर्ण की है। बीएड में भी नाम आ गया, लेकिन घरेलू परिस्थितियों के चलते दाखिला नहीं ले सकी। पिता प्राइवेट टीचर हैं। तीन बहन और एक भाई हैं। उसने बताया कि नौकरी के लिए लगभग आठ स्थानों पर आवेदन किया। मगर कहीं मौका नहीं मिला। यात्रियों से भरी बस में कंडक्टर के रूप में ड्यूटी के सवाल पर आरती का कहना है कि जब लड़कियां अंतरिक्ष पर जा सकती हैं और प्लेन व ट्रेन चला सकती हैं तो बस में टिकट काटने में क्या दुश्वारी है ? वह इस नौकरी को बाखूबी निभाएंगी।
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यात्रियों के बीच ड्यूटी से न गुरेज न परहेज
महोबा निवासी कुमारी कृष्णा कुमारी ने वर्ष 2014 में महोबा से मैकेनिकल में पालीटेक्निक किया है। पिता मूलचंद्र ठेकेदार हैं। मां समेत चार बहनें और एक भाई हैं। कृष्णा का कहना है कि यात्रियों के बीच ड्यूटी करने में उसे न गुरेज न परहेज है। चुनौतीपूर्ण काम करना उसका शौक है। बुंदेलखंड की महिलाओं का इतिहास बहादुरी से भरा पड़ा है। कृष्णा ने बताया कि पढ़ाई पूरी करने के बाद उसने पहली बार परिवहन निगम में आवेदन किया था। पहली मर्तबा में ही उसे सफलता हाथ लगी। उसकी बड़ी बहन भी पालीटेक्निक कर चुकी है और उसका बिजली विभाग में जेई के लिए इंटरव्यू होने वाला है।


कंडक्टर बनीं, लक्ष्य है इंजीनियर बनना
रोडवेज में कंडक्टर बनीं कुमारी अनीता भी महोबा की हैं। उसने भी वर्ष 2014 में मैकेनिकल से पालीटेक्निक किया है। पिता रेलवे में हैं। इंटर पास करने के बाद पालीटेक्निक किया और परिवहन निगम में कंडक्टर के लिए आवेदन किया। भाग्य ने साथ दिया। उसका चयन हो गया। अनीता का कहना है कि सरकारी नौकरी का क्रेज अलग है। भले ही वह रोडवेज में कंडक्टर का पद हो या कोई और। अनीता ने यह भी कहा कि उसका लक्ष्य इंजीनियर बनने का है। इसके लिए वह लगातार कोशिश करती रहेगी। फिलहाल कंडक्टर पद पर नौकरी का मकसद पिता के कंधों का भार कम करना है। अनीता ने अन्य छात्राओं और महिलाओं से कहा संकोच छोड़कर समाज में अपना स्थान बनाएं।
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