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एक बीघे में पैदा हुआ सिर्फ 20 किलो गेहूं

Sat, 31 Mar 2018 10:52 PM IST
अमर उजाला ब्यूरो, बांदा
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खेत में स्थित खलिहान में खड़े जयंद सिंह। - फोटो : अमर उजाला
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फसल ने बुंदेलखंड के किसानों को फिर दगा दे दिया। मौसम की मार ने उत्पादन औंधे मुंह गिरा दिया। हालत यह है कि एक बीघा में मात्र 20 किलो गेहूं और 10 किलो चना निकला। मड़ाई के बाद यह हालत देखकर किसान सदमे में हैं। 

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बुंदेलखंड में कई साल से दैवी आपदा से फसलें चौपट हो रही हैं। कभी सूखा तो कभी बेमौसम की बारिश या ओलावृष्टि की मार। इस वर्ष रबी की फसल में मौसम मेहरबान नजर आया तो किसानों ने उम्मीदों के साथ बुआई कर दी, लेकिन कुदरत ने फिर चपत लगाई। सिंचाई के लिए पानी नहीं बरसा। बिन पानी जो फसल तैयार हुई, उसमें पिछले माह ओले और बेमौसम की बारिश ने चौपट कर दिया।

अब फसल काटी जा रही है। किसानों की मेहनत के साथ उम्मीदों पर भी पानी फिर गया है। इसकी बानगी बांदा जिले का मटौंध क्षेत्र है। यहां के किसान विशाल सिंह ने अपनी 27 बीघा जमीन में गेहूं, चना, मसूर, मटर बोया था। इस क्षेत्र में सिंचाई के साधन नहीं हैं। बारिश पर ही खेती आधारित है। सब कुछ ठीकठाक रहे तो यहां के खेतों में प्रति बीघा 50-50 किलो कठिया गेहूं, चना के अलावा मटर होती है।
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मसूर भी 25 किलो प्रति बीघा होती है। दो दिन पूर्व मड़ाई में मेहनत का जो फल सामने आया उसे देखकर वृद्ध किसान विशाल सिंह के होश उड़ गए। उन्हें गहरा सदमा लगा। प्रति बीघा मात्र 20-20 किलो चना, गेहूं और मटर पैदा हुई है। मसूर भी 10 किलो निकली।

किसान विशाल सिंह बताते हैं कि 15 से 18 किलो चने का बीज एक बीघा में बोया था। मात्र 20 किलो पैदा हुआ है। इसमें पांच बार जुताई, एक बार बुआई, 900 रुपये बीघा फसल कटाई की मजदूरी और 500 रुपये प्रति बीघा बीज की लागत आई थी, यानी रबी की फसल घाटे का सौदा साबित हुई। कमोवेश यही स्थिति यहां के अन्य किसान जयंद सिंह, जयराम सिंह, खुशाली सिंंह और शिवशरण शुक्ला आदि की है। किसान पशोपेश और असमंजस में हैं कि साल भर क्या खाएं और अगली फसल के लिए क्या बचा है?  
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भरपाई बीमा से भी नहीं हो पाई
बांदा। फसल में हुए घाटे की भरपाई फसल बीमा से भी नहीं हो पाई। किसानों का तजुर्बा यही बताता है। मटौंध क्षेत्र के किसान जयराम सिंह और खुशाली सिंह ने बताया कि पिछले वर्ष 2017 में कृषि विभाग के बहकावे में आकर एक हजार रुपये नगद जिला कृषि कार्यालय में जमा करके फसल बीमा कराया था। फसल का यह हश्र हुआ है कि बीज तक नहीं लौटा। लागत को दरकिनार, लेकिन बीमा भी नहीं मिल रहा। गाढ़ी कमाई का एक हजार रुपये भी चला गया। ब्यूरो

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