शहर को महानगरों की तर्ज पर व्यवस्थित ढंग से बसाने और नागरिकों को बुनियादी सुविधाएं दिलाने के सब्जबाग दिखाकर स्थापित किया गया बांदा विकास प्राधिकरण शहरी बाशिंदों से ‘वाह’ नहीं कहला सका। अलबत्ता बाशिंदे ’आह’ जरूर भर रहे हैं।
स्थापना के 37 वर्षों बाद भी प्राधिकरण शहर को कोई सड़क, पुलिया या मनोरंजन स्थल नहीं मुहैया करा पाया। अलबत्ता साधारण और गरीब नागरिकों द्वारा जुगाड़ से अपना आशियाना पक्का बनाएं तो नोटिस जरूर जारी कर देता है। प्राधिकरण की ताजा आरटीआई सूचना में स्पष्ट रूप से स्वीकारा गया है कि इस समय कोई विकास या निर्माण कार्य नहीं चल रहा। करीब चार साल में मात्र 63 मानचित्र (नक्शे) निस्तारित हुए हैं।
आरटीआई कार्यकर्ता कुलदीप शुक्ला को प्राधिकरण ने दी सूचना में बताया कि बांदा विकास प्राधिकरण का गठन 24 नवंबर 1981 को हुआ था। वर्तमान में प्राधिकरण का कोई विकास या निर्माण कार्य नहीं चल रहा है। योजनाओं के नाम पर इंदिरा नगर आवासीय योजना, तुलसी नगर आवासीय योजना और दीनदयाल पुरम आवासीय योजनाएं चल रही हैं। यह भी बताया है कि पिछले चार साल में वर्ष 2015-16 से जनवरी-2018 तक प्राधिकरण में मंजूरी के लिए कुल 121 मानचित्र दाखिल हुए। इनमें मात्र 63 का निस्तारण किया गया। 58 नहीं निस्तारित किए गए। उधर, कुलदीप शुक्ल ने बताया कि प्राधिकरण आरटीआई सूचना देने से आनाकानी करता रहा। इस पर उन्होंने राज्य सूचना आयोग में अपील की। राज्य आयोग ने प्राधिकरण को नोटिस जारी कर तलब तो आनन-फानन में सूचना दी।
वसूलते हैं अनेकों शुल्क, ब्योरा देने से कन्नी काटी
विकास प्राधिकरण शहर के नागरिकों से विकास शुल्क, उप विभाजन शुल्क, पर्यवेक्षण शुल्क, अंबार शुल्क, लेबर सेस, सुदृढ़ीकरण शुल्क और मानचित्र अनुज्ञा शुल्क वसूलता है। आरटीआई में कुलदीप शुक्ल ने सूचना मांगी थी कि कुल कितना शुल्क वसूला गया है, लेकिन प्राधिकरण के अधिशासी अभियंता/जन सूचना अधिकारी रकम का खुलासा करने से यह कहकर कन्नी काट गए कि इसकी सूचना अलग से संकलित नहीं है। यानी प्राधिकरण में राजस्व संबंधी अभिलेख मेनटेन नहीं है। ब्यूरो
बिना काम का वेतन ले रहा स्टाफ
निर्माण और अन्य कोई कार्य भले ही प्राधिकरण में नहीं चल रहे हैं, लेकिन यहां अभियंताओं से लेकर स्टाफ की भरमार है। अभियंता बिना काम के वेतन ले रहे हैं। काम के नाम पर शहर में कहीं छोटी से कोठरी के निर्माण की भनक लग जाने पर नोटिस जारी किए जा रहे हैं। इनमें अधिकांश मामले रफा-दफा हो जाते हैं। आरटीआई में दी सूचना के मुताबिक प्राधिकरण में दो दर्जन कर्मी हैं। सबसे ज्यादा 9 अवर अभियंता (जेई) हैं। प्राधिकरण की स्थापना के बाद यह अब तक की सबसे बड़ी संख्या है। इसके अलावा एक अधिशासी अभियंता, दो सहायक अभियंता भी हैं। लेखाकार, सहायक लेखाकार, लिपिक, टाइपिस्ट एक-एक और चतुर्थ श्रेणी कर्मी चार हैं।