बांदा। सिंचाई विभाग की टेक्निकल कमेटी ने 115 वर्ष पुराने बरियारपुर बांध की मरम्मत से हाथ खड़े कर दिए हैं। कमेटी ने केंद्रीय जल आयोग को भेजी रिपोर्ट में कहा है कि बांध की मरम्मत कराना खतरे से खाली नहीं है। इसकी क्षमता घटती जा रही है।
अब डाउन स्ट्रीम पर नया बांध बनाने की जरूरत है। इसके लिए प्रस्ताव भेजा है। उधर, 121 वर्ष पुराने झांसी के पारीछा बांध की मजबूती पर भी टेक्निकल कमेटी ने उंगली उठाई है। इसी तरह बरुआ सागर बांध भी काफी पुराना बताकर इसकी मरम्मत से इन्कार किया है। बारिश का मौसम खत्म होने के पर अब सितंबर में कभी भी केंद्रीय टीम आकर तीनों बांधों का निरीक्षण कर सकती है।
बरियारपुर बांध की क्षमता 12.50 मिलियन क्यूबिक मीटर (एमसीएम) है। इससे मुख्य केन नहर निकली है। इसी बांध की मदद से जिले में लगभग 1100 किमी नहरों से सिंचाई की जाती है। केन नदी पर लगभग 650 मीटर लंबी दीवार (क्रस्टवाल) है। इसके अंदर सुरंगनुमा रास्ता है। दीवार के ऊपर 8.23 फीट लंबे, फीट फीट चौड़े और फीट फीट ऊंचे भारी भरकम लोहे के फाटक लगे हैं।
इन्हीं को खड़ा करके पानी रोका जाता है। बारिश में जब बांध उफान मारता है, तब इसकी दीवार से लाखों क्यूसेक पानी बहता है। उधर, बेतवा नदी में बना परीछा बांध 121 वर्ष पुराना है। पारीछा से करीब 112 मील ऊपर वर्ष 1901 में इसका निर्माण हुआ था। सिंचाई विभाग के अभियंता पारीछा बांध की उम्र पूरी होने का हवाला पहले ही दे चुके हैं।
साथ ही केन-बेतवा लिंक परियोजना के अस्तित्व में आने के बाद पारीछा बांध की जगह नया बांध बनाने की कवायद भी तेज हो गई। इसके तहत टेक्निकल कमेटी (तकनीकी समिति) ने भी सिंचाई अभियंताओं की दलीलों और नए बांध के प्रस्ताव पर मुहर लगा दी है। इसी तरह बरुआ सागर बांध की मरम्मत को भी तकनीकी समिति ने खारिज कर दिया है।
सिंचाई विभाग के अधीक्षण अभियंता श्याम जी चौबे का कहना है कि बरियारपुर, पारीक्षा और बरूवा सागर बांध जर्जर हैं। विभाग मरम्मत के नाम पर हर साल लाखों रुपये खर्च करता है। केन-बेतवा परियोजना के तहत इस बांध को भी नया बनाने के लिए रिपोर्ट केंद्रीय जल आयोग को भेजी है। अब बारिश के बाद केंद्रीय जल आयोग की टीम कभी भी बांध का सर्वे करने आ सकती है।
नया बांध बनने से क्षमता बढ़ेगी
नया बांध बनने से पानी के भंडार की क्षमता बढ़ेगी। फाटक भी ज्यादा लंबे चौड़े बनेंगे। बारिश का पानी बर्बाद नहीं होगा। फाटक खोलने बंद करने में दिक्कत नहीं आएगी। मौजूदा बांधों में फाटक खड़े करने या गिराने के लिए कर्मचारी व मजदूरों को काम कम करना पड़ेगा।