बांदा। राजकीय आयुर्वेदिक अस्पताल खुद बीमार है। यहां 95 फीसदी दवाएं नहीं हैं, न उपकरण हैं। पलंग पुराने और जर्जर हैं। गद्दे फटे हैं और चादरें गंदी। लाखों रुपये कीमत की फोटोथेरेपी और सक्शन मशीनें स्टोर में धूल फांक रही हैं। स्टाफ की कमी से मरीजों को सिर्फ छह घंटे ही भर्ती किया जाता है। इसके बाद उन्हें घर भेज दिया जाता है। यहां औसतन रोजाना 45 मरीज आते हैं।
बांदा और चित्रकूट जिले में 35 राजकीय आयुर्वेदिक अस्पताल हैं। इनमें बांदा में 24 और चित्रकूट जिले में 11 अस्पताल हैं। मंडल मुख्यालय में राजकीय आयुर्वेदिक अस्पताल मंडी समिति परिसर में स्थित किराए के भवन में वर्ष 1991 से चल रहा है।
15 बेड के इस अस्पताल में सिर्फ आठ बेड ही पड़े हैं। वह इतने जीर्णशीर्ण अवस्था हैं कि मरीजों को सिर्फ कामचलाऊ तरीके से भर्ती किया जाता है। पंचकर्म कक्ष में मरीजों का इलाज जुगाड़ व्यवस्था से होता है। आलम यह है कि सिर रखने के लिए टेबिल की जगह व्हील चेयर का इस्तेमाल किया जा रहा है।
अव्यवस्थाओं का हाल यहीं बस नहीं रुकता, बल्कि सारे बाथरूम चोक (बंद) हैं। गद्दे पुराने और फटे हैं। चादर-कंबल गंदे हैं। दवाओं का सबसे बुरा हाल है। अस्पताल में 95 फीसदी दवाएं नहीं हैं। सिर्फ पांच फीसदी दवाओं के सहारे मरीजों का इलाज हो रहा है। आलम यह है कि इसका मरीजों को भरपूर फायदा नहीं मिल रहा है। रात के स्टाफ की व्यवस्था न होने से मरीजों को भर्ती नहीं किया जाता। सुबह 10 से शाम 4 बजे तक ही मरीजों को भर्ती किए जाने का दावा किया गया है।
आयुर्वेदिक अस्पताल में रोजाना 45-50 मरीज ओपीडी में आते हैं। लेकिन दवाओं के अभाव में उनका बेहतर इलाज नहीं हो पा रहा। नतीजतन उन्हें बाहर से दवाएं खरीदना पड़ रही है। कालूकुआं निवासी राजेश कुमार ने बताया कि जोड़ के दर्द की शिकायत है। उन्हें जड़ीबूटी से बनी गोली दी गई, पर तेल नहीं मिला। बताया गया कि तेल नहीं है। इसी तरह बाबा तालाब निवासी अमरजीत सिंह ने बताया कि गर्दन और कमर में दर्द रहता है। इलाज कराने पर कुछ दवाएं थमा दी गईं, बाकी दवाएं नहीं मिली। कहा गया कि दवाएं नहीं हैं।
पंचकर्म इलाज के लिए कोई उपकरण नहीं है। इसकी लगातार मांग की जा रही है। दवाएं खत्म होने पर उच्चाधिकारियों को अवगत कराया गया है। भरतकूप की खराब हो चुकी दवाओं के बारे में भी उच्चाधिकारियों को अवगत कराया गया है। टूटे पलंग और फटे गद्दों को बदलने के लिए बजट की मांग की गई है। लेकिन अब तक मंजूरी नहीं मिली। आलम यह है कि मरीजों के लिए वह खुद हर साल अपनी जेब से करीब 25-30 हजार रुपये खर्च कर रहे हैं।
- डॉ.नीरज सोनी, प्रभारी चिकित्साधिकारी, राजकीय आयुर्वेदिक अस्पताल, बांदा।
पंकज शर्मा
विशेष पलंग न होने पर पंचकर्म कक्ष में व्हील चेयर बांधकर जुगाड़ से तैयार किया गया बेड।- फोटो : BANDA