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‘आशिकों का मेला’ आज

Fri, 13 Jan 2017 11:20 PM IST
ब्यूरो अमर उजाला, बांदा
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भूरागढ़ दुर्ग के नजदीक बना नटबली मंदिर। - फोटो : amarujala
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प्रेमिका को पाने के लिए सूत की रस्सी पर चलकर नदी पार करते समय जान गंवा बैठे युवा नटबली की याद में एक बार फिर ‘आशिकों का मेला’ तैयार है। शनिवार को केन नदी और भूरागढ़ दुर्ग के बीच स्थित युवा नटबली और उसकी प्रेमिका की याद में बने मंदिरों पर मेला लगेगा। प्रेमी-प्रेमिका इस मेले का बेसब्री से इंतजार करते हैं।
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शहर की सीमा पर केन नदी और भूरागढ़ दुर्ग के बीच दो प्राचीन मंदिर प्रेम में सब कुछ न्योछावर कर देने वाले नटबली की याद दिलाते हैं। किंवदंती है कि महोबा जनपद के सुगिरा का रहने वाला नोने अर्जुन सिंह भूरागढ़ दुर्ग का किलेदार था। यहां से कुछ किलोमीटर दूर सरबई (मध्य प्रदेश) गांव है। वहां नट जाति के लोग आबाद थे।

अक्सर करतब दिखाने और कामकाज के लिए नट भूरागढ़ आते थे। किले में काम करने वाले एक युवा नट से किलेदार की पुत्री को प्रेम हो गया। नोने अर्जुन सिंह को इसका पता चला तो पहले तो नाराज हुआ फिर बाद में उसने प्रेमी युवा नट से यह शर्त रखी कि सूत की रस्सी पर चलकर नदी पार कर किले में आए। अगर ऐसा कर लेगा तो वह अपनी पुत्री से उसकी शादी कर देगा। नट ने शर्त मान ली।
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खास मकर संक्रांति के दिन सन 1850 ईस्वी में नट ने प्रेमिका के पिता की शर्त पूरी करने के लिए नदी के इस पार से लेकर किले तक रस्सी बांध दी। इस पर चलता हुआ वह किले की ओर बढ़ने लगा। उसका हौसला बढ़ाने के लिए नट बिरादरी के लोग रस्सी के नीचे चलकर गाजे-बाजे बजा रहे थे। नट ने रस्सी पर चलते हुए नदी पार कर ली और दुर्ग के करीब जा पहुंचा।

यह तमाशा नोने अर्जुन सिंह किले से देख रहा था। उसकी पुत्री भी अपने प्रेमी के साहस का नजारा देख रही थी। युवा नट दुर्ग में पहुंचने को ही था कि तभी किलेदार नोने अर्जुन सिंह ने रांपी से रस्सी काट दी। नट नीचे चट्टानों पर आ गिरा और उसकी वहीं मौत हो गई। प्रेमी की मौत का सदमा किलेदार की पुत्री को बर्दाश्त न हुआ और उसने भी दुर्ग से छलांग लगाकर जान दे दी। इन दोनों प्रेमी-प्रेमिकाओं की याद में घटनास्थल पर दो मंदिर बनाए गए। दोनों मंदिर आज भी बरकरार हैं।

नट बिरादरी के लोग इसे विशेष तौर पर पूजते हैं। प्रेमी-प्रेमिकाओं के लिए भी यह खास दिलचस्पी का स्थल बन गया। तभी से हर साल मकर संक्रांति के दिन यहां नटबली मेला लगता है। नटबली मेले की पृष्ठभूमि में प्रेमी-प्रेमिका की कहानी को इतिहासकार नकारते हैं। उनका कहना है कि यह मात्र एक किंवदंती और कहानी है। उन्होंने बताया कि दरअसल सरबई गांव के नटों ने अंग्रेजों से युद्ध कर बलिदान दिया था। भूरागढ़ दुर्ग को बचाने के लिए सैकड़ों नटों ने युद्ध में जान गंवाई थी। उनके इसी बलिदान और बहादुरी की याद में नटबली स्थल बनाया गया। इस स्थान पर कई और क्रांतिकारियों की समाधि और कब्रें भी हैं। लेकिन प्रेमी-प्रेमिका की कहानी ने इसे पीछे कर दिया है।
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