10वीं मोहर्रम को बांदा में कर्बला की ओर जाता ढालों का कारवा।
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बांदा। चमकते कपड़ों पर नक्काशी से सजी धजी और फूल मालाआें से लदी ढालों और 50 से अधिक ताजियों को प्रतीकात्मक कर्बला और केन नदी किनारे दफन कर दिया गया। इसमें हिंदू-मुस्लिम शामिल होकर सांप्रदायिक सौहार्द की मिसाल बने रहे। इसी के साथ 10 दिन से चल रहे मोहर्रम के आयोजन खत्म हो गए। 10वीं मोहर्रम को यौमे आशूरा भी मनाया गया। लोगों ने रोजा रखकर इबादतें और दुआएं कीं।
मंगलवार की पूरी रात 9वीं पर शहर में रतजगा रहा। 56 इमामबाड़ों के पास आग से दहकते अंगारे हाथों से लुटाकर अलाव खेला गया, जो तड़के तक चला। इसी के बाद ढाल सवारियाें के जत्थे ढोल-ताशा और गिटार व बैंड की धुनों के बीच निकल पड़े। रात भर शहर मेें इनकी धूम रही। उधर, 10वीं पर बुधवार को दोपहर बाद फिर इमामबाड़ों में ढोल-ताशोें की धुनें गूंज उठीं। इमामबाड़ों में रखी ढाल, नेजा, अलम और ताजिये अलग-अलग जत्थों में कर्बला (केन नदी किनारे) की ओर चल पड़े। इमामबाड़े सूने हो गए।
मयूर टाकीज रोड, जीजीआईसी, पदमाकर चौराहा, बलखंडी नाका चौराहा, कटरा रोड, क्योटरा चौराहा से लेकर केन नदी तक शाम को तिल रखने की जगह नहीं रही। ढाई हजार से ज्यादा ढाल-सवारियां लगभग 50 छोटे-बड़े ताजिये और सैकड़ों नेजे और अलम सूरज ढलने के वक्त प्रतीकात्मक कर्बला पहुंचे। हरेक के साथ हुजूम था। यहां ढालों को खोलकर उनकी कुछ सामग्री जमीन में दफन कर दी गई। ताजियों को केन नदी किनारे खोदे गए गड्ढों में दफन कर दिया गया। यहां देर रात तक मेला रहा।
इसके पूर्व दोपहर को पूर्वी कोठी शिया इमामबाड़ों से अलम और ताजिये केन किनारे स्थित कर्बला के लिए रवाना हुए। ताजियों को यहां दफनाया गया। आखिरी दिन भी जगह-जगह लंगर हुए। पुलिस और पीएसी का पहरा रहा। प्रशासन और पुलिस के अफसर भी पूरे समय मौजूद रहे। मोहर्रम कमेटी पदाधिकारी मोहम्मद शोएब, अब्दुल वहीद, अजीज उर्फ अज्जन भी उपस्थित रहे।