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बुंदेलखंड में पैदा होगा हैदराबाद-अल्मोड़ा का रागी व झंगोरा

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बुंदेलखंड के खेतों में हैदराबाद व पर्वतीय क्षेत्र अल्मोड़ा का झंगोरा (सांवा), रागी (मड़ुवा), काकुन (कौडी) व कोदो की फसल लहलहाएगी। इसकी शुरुआत बांदा कृषि विश्वविद्यालय के फार्म हाउस में उत्पादन से हो गई। अब यूनिवर्सिटी से तैयार बीज और बुआई व उत्पादन तकनीक बुंदेली किसानों तक पहुंचाने की तैयारी है। विश्वविद्यालय के कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि बेहतर तकनीकी व प्रमाणित बीजों से एक बार फिर सूखे से प्रभावित बुंदेलखंड में मोटे अनाजों की फसलें उगेंगी। इसके लिए किसानों को प्रोत्साहित किया जा रहा है। हालांकि खरीफ में मोटे अनाज उत्पादन का प्रयास सफल रहा।
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खरीफ 2018 में कृषि विश्वविद्यालय ने सांवा, कोदों की बुआई कर शुरुआत कर दी है। प्रयोग सफल रहा तो अब इसे वृहद रूप देने की तैयारी है। सांवा, कोदो के साथ मडुुवा व काकुन भी पैदा किया जाएगा। उत्पाद बढ़ाने के लिए स्थानीय परिस्थितियों व अनुभव के साथ हैदराबाद मिलेट्स अनुसंधान व उत्तराखंड अल्मोड़ा के विवेकानंद पर्वतीय अनुसंधान संस्थान से तकनीकी व उच्च प्रजाति के बीजों का प्रयोग कृषि विश्वविद्यालय में होगा। बांदा विश्वविद्यालय के शस्य विज्ञान सह प्राध्यापक डा.एसबी सिंह ने बताया कि अल्मोड़ा ठंडा क्षेत्र है। बुंदेलखंड की जलवायु मिलीजुली है। यहां गर्मी भी अधिक होती है। प्रयोग के तौर पर अल्मोड़ा के बीज तैयार किए जा रहे हैं। प्रयोग सफल रहा तो किसानों को इसके बीज बोने के लिए प्रोत्साहित किया जाएगा। बुंदेलखंड के कुल कृषि क्षेत्रफल में लगभग पांच प्रतिशत क्षेत्र में मोटे अनाजों की बुआई कराई जाएगी।


कृषि विश्वविद्यालय के फार्म हाउस में खरीफ 2018 में 200 वर्ग मीटर से अधिक क्षेत्रफल में सांवा, कोदो प्रयोग के तौर पर बोया गया था। सांवा की मड़ाई के बाद प्रति हेक्टेअर उत्पादन 14 क्विंटल निकला है। बुंदेलखंड का ही बीज बोया गया था। विश्वविद्यालय के विशेषज्ञों के मुतबिक इतनी पैदावार अच्छे संकेत है। उधर, कोदों के उत्पादन के प्रयास को अन्ना पशुओं ने फेल कर दिया। इसकी सारी फसल अन्ना गायें चर गईं।
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बुंदेलखंड कृषि आधारित क्षेत्र है। अकेले चित्रकूटधाम मंडल में 10 लाख 50 हजार हेक्टेअर से अधिक क्षेत्रफल में दलहन-तिलहन समेत धान, गेहूं व जौ की फसलें पैदा होती हैं। खरीफ व रबी के अलावा यहां गर्मी में होने वाली जायद की फसलें न के बराबर होती हैं। क्योंकि सिंचाई व अन्ना मवेशियों से फसलों को बचाना किसानों के लिए बड़ा मुद्दा है।


बांदा कृषि विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. यूएस गौतम ने बताया कि करीब पांच दशक पहले तक बुंदेलखंड में सांवा, कोदो व काकुन की फसलों की अच्छी पैदावार होती रही है। इनसे पर्याप्त पौष्टिक भोजन मिलता रहा है। लेकिन अब ये फसलें विलुप्त हो गई हैं। कृषि विश्वविद्यालय मोटे अनाजों पर शोध कर रहा है। अच्छी प्रजातियों का प्रयोग कर नए सिरे से मोटे अनाज की खेती शुरू कराने की पहल की जा रही है।
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-कृषि विश्वविद्यालय बीजों पर शोध शुरू
-किसानों तक पहुंचाई जाएंगे प्रमाणित बीज व तकनीक
अमर उजाला ब्यूरो
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