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एक्थाइमा रोग से 50 बकरियों की मौत

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बदौसा। ठंड और बारिश के मौसम के बीच बकरियों का एक्थाइमा (मुख शोथ) रोग फैल रहा है। क्षेत्र के तरसूमा गांव में इसका सबसे ज्यादा प्रकोप है। यहां तीन दिनों के अंदर 50 से अधिक बकरियों की मौत हो गई है। इससे पशुपालकों में हड़कंप है।
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कई दिनों से बारिश और ठंड के चलते पशु रोग की चपेट में आ रहे हैं। तरसूमा गांव में बकरियों की ताबड़तोड़ हुई मौतों का सिलसिला जारी है। पशु विशेषज्ञ इसे एक्थाइमा रोग से मौतें बता रहे हैं। इस गांव के ब्रजलाल केवट की 15 बकरियां, गोपाल वर्मा की 11 बकरियां, जगन्नाथ व शिवबरन की 7-7, धर्मा व फलवा वर्मा की 3-3, कमरू की 4, संती की 2 बकरियों की मौत हो गई। इन बकरी पालकों ने बताया कि शुरुआत में बकरी का गला सूज जाता है। मुंह में घाव हो जाते हैं। पतले दस्त आते हैं। करीब छह घंटे में बकरी की मौत हो जाती है। पशुपालकों ने बताया कि बदौसा के पशु चिकित्सक को कई बार फोन किए, मगर उनका फोन रिसीव नहीं हुआ। वहां पशु चिकित्सालय के बाहर दीवार पर लिखे दो नंबरों पर भी कॉल की गई। लेकिन उन पर फोन रिसीव नहीं हुए। पशुपालकों ने कहा कि यहां के पशु चिकित्सक ज्यादातर नदारद रहते हैं।
उधर, जनपद के मुख्य पशु चिकित्साधिकारी डा. आईएन सिंह ने तरसूमा में बकरियों की मौत और फैले रोग से अनभिज्ञता जताई। कहा कि ठंड और शीलन आदि में बकरियों को आमतौर पर अस्थमा हो जाता है। खांसी से कमजोर हो जाती हैं। कभी-कभार मौत भी हो जाती है। उन्होंने कहा कि बकरियों की मौत के बारे में पता कराएंगे।
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क्या है एक्थाइमा (मुख शोथ) रोग
यह विषाणु जन्म छूत की बीमारी है। सामान्यत: बकरी और भेड़ में होती है। शावक (बच्चा) में यह रोग अधिक होता है। बकरियों के मुंह के कोने और होठों के चारों तरफ छोटे-छोटे लाल मसा निकलते हैं। कुछ दिन बाद इनमें पस भर जाता है। यह अपने आप फूटकर सूख जाते हैं। यह प्रक्रिया लगभग एक माह तक चलते हैं। बकरी खा नहीं पाती और कमजोर हो जाती है। कभी-कभी यह रोग आंख व शरीर के अन्य हिस्सों में भी हो जाता है। बकरियों की शारीरिक वृद्धि घट जाती है।
बचाव : क्या करना चाहिए
विशेषज्ञ बताते हैं कि एक्थाइमा रोग का कोई विशेष इलाज नहीं है। घाव में हीमैक्स, सोरिन, ओकार्डिन आदि लगाने से फायदा होता है। एक बार होने के बाद अगले 2-3 वर्षों में यह रोग पुन: नहीं होता। इसका प्रतिरोधक टीका होता है, लेकिन बाजार में यह उपलब्ध नहीं है।
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