बांदा। प्रवासियों को महानगरों से वतन लेकर आ रही श्रमिक स्पेशल ट्रेनों का सिलसिला जारी है। गुरुवार को मुंबई से 3890 प्रवासी मजदूरों की और यहां आमद हुई। ये दो विशेष ट्रेनों में आए। इनमें 2482 श्रमिक बुंदेलखंड के थे। शेष 12 अन्य जिलों और एमपी के थे। सभी को सोशल डिस्टेंसिंग के साथ ट्रेन से उतारकर रोडवेज की 40 बसों से क्वारंटीन सेंटर रवाना किया गया। अब तक यहां आने वाली विशेष श्रमिक ट्रेनों की संख्या बढ़कर 25 हो गई है। इनमें आए मजदूरों का आंकड़ा 33 हजार पार कर गया है।
तहसीलदार अवधेश निगम ने बताया कि पहली ट्रेन गुरुवार को सुबह 11 बजे आई। इसमें 2262 श्रमिक सवार थे। बुंदेलखंड के 1656 मजदूर थे। सर्वाधिक 1641 मजदूर बांदा जिले के आए। चित्रकूट के 8, हमीरपुर के 5, जालौन के 2 श्रमिक भी शामिल रहे। दूसरी ट्रेन दोपहर 2 बजे आई। इसमें कुल 1634 श्रमिकों में 826 बुंदेलखंड के थे।
बांदा जिले के सर्वाधिक 798, चित्रकूट के 27, महोबा का एक मजदूर आया। इसके अलावा फतेहपुर-1234, कौशांबी-59, प्रयागराज-36, भदोही-3, कानपुर-8, हरदोई-2, प्रतापगढ़-24, रायबरेली-19, उन्नाव-2, गोंडा-1, लखनऊ-2 और मध्य प्रदेश के 11 श्रमिक आए। सीओ सिटी आलोक कुमार मिश्रा, एसडीएम सुरजीत सिंह, एआरएम परमानंद पिल्लई, स्टेशन मास्टर एसके कुशवाहा आदि मौजूद रहे।
1300 के जूते 400 में बेचकर मिटाई भूख
22 मई को मुंबई से अपने घर फतेहपुर के लिए रवाना हुए प्रवासी मजदूर शुभम सोलंकी ने जूते बेचकर यहां तक का सफर पूरा किया। उसने बताया कि तीन माह पूर्व उसने 1300 रुपये के स्पोर्ट्स शूज मुंबई में खरीदे थे। वह एक मोबाइल फैक्ट्री में काम करता था। इसी बीच लॉकडाउन की मुसीबत आ पड़ी।
फैक्ट्री बंद हो गई। पैसे नहीं मिले। ऐसे में उसके खरीदे जूते काम आए। 1300 के जूते मात्र 400 रुपये में बेच दिए। इन पैसों से कुछ दिन उसका पेट भरा। घर रवानगी के लिए एक सेठ से आरजू-मिन्नत करके 2500 रुपये उधार लिए। झांसी तक लोडर में आया। वहां से कुछ दूर पैदल चला। फिर टुकड़ों-टुकड़ों में वाहनों से की यात्रा के बाद गुरुवार को बांदा आया है।
अंगूठी बेचकर दिया किराया, सिलिंडर बेचकर घर आया
गए थे कमाने। लौटे गंवाकर। जिले के जसपुरा गांव निवासी राजकुमार श्रीवास की कुछ यही कहानी है। गुरुवार को महाराष्ट्र के भिवंडी से लौटे राजकुमार ने बताया कि इलेक्ट्रिक शॉप में काम करता था। लॉकडाउन में दुकान बंद हुई तो आमदनी भी नहीं रही।
बचाखुचा पैसा खाने-पीने में खर्च हो गया। मकान मालिक किराए के लिए दबाव बनाए था। उसने चांदी की चेन और दो अंगूठी 1200 रुपये बेची और मकान का किराया भरा। 1500 रुपये में गैस सिलिंडर और चूल्हा बेचकर रास्ते का खर्च जुटाकर 20 मई को घर के लिए चल पड़ा। तमाम दुश्वारियां सह कर गुरुवार को यहां पहुंचा है। यहां आते-आते उसके पास मात्र 70 रुपये ही बचे। अब दोबारा परदेस नहीं जाएगा।
शुभम सोलंकी।- फोटो : BANDA
राजकुमार श्रीवास- फोटो : BANDA