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क्षेत्रीय दलों के वजूद ने उतार दिया लाल झंडा

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लगभग तीन दशक तक बांदा-चित्रकूट संसदीय क्षेत्र में लाल परचम यानी कम्युनिस्ट पार्टी का जलवा रहा। संसद से लेकर विधानसभा तक अधिकांश सीटों पर कब्जा रहा, लेकिन बसपा और सपा जैसी क्षेत्रीय पार्टियों के वजूद में आने के बाद वामपंथी दल हाशिये पर आ गए। पिछले करीब डेढ़ दशक से इन दलों के प्रत्याशी जमानत बचाने के लायक भी वोट नहीं पा रहे। हालांकि अपना अस्तित्व बरकरार रखे हैं।
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बुंदेलखंड के इस क्षेत्र में कम्युनिस्टों का जलवा इस कदर था कि 1967 में राजनीति में एकदम अंजाम चेहरा जागेश्वर यादव को लोकसभा का चुनाव लड़वाया और जितवाकर सांसद बनवा दिया।


जागेश्वर यादव ने जनसंघ प्रत्याशी आचार्य प्रभाकर मिश्र को पराजित किया। इसके बाद 1971 के कम्युनिस्ट पार्टी के प्रत्याशी देव कुमार यादव सिर्फ सात हजार वोटों से जीत से चूक गए।
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विधानसभा चुनाव में भी कम्युनिस्ट पार्टी का बोलबाला रहा। कर्वी, बबेरू और नरैनी विधानसभा सीटें तो जैसे इस पार्टी का गढ़ बन गई थीं। 1967, 1969, 1977 और 1985 के विधानसभा चुनाव में कर्वी से रामसजीवन भारी मतों से विजयी हुए।


1989 में यही रामसजीवन लोकसभा चुनाव में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी से प्रत्याशी हुए और 1,04,142 वोट (27 फीसदी) हासिल करके सांसद बन गए। उन्होंने बसपा के चंद्रभान आजाद को 27,247 वोटों से शिकस्त दी। इसी वर्ष कर्वी विधान सभा सीट के चुनाव में सीपीआई से राम प्रसाद विधायक का चुनाव जीते।

1991 में भी उन्होंने जीत हासिल की। नरैनी सीट से 1972 में कम्युनिस्ट पार्टी के चंद्रभान आजाद विधायक चुने गए। 1977, 1985 और 1989 में डॉ. सुरेंद्रपाल वर्मा ने कम्युनिस्ट पार्टी से विधानसभा का चुनाव जीता।


बबेरू विधान सभा सीट से देव कुमार यादव सीपीआई के बलबूते चार बार विधायक बने, लेकिन 90 के दशक में बहुजन समाज पार्टी के वजूद में आने के बाद कम्युनिस्ट पार्टी के मुख्य वोट बैंक अनुसूचित जाति के मतदाताओं ने बसपा की तरफ रुझान कर लिया।

समय के इस बदलाव के साथ ही कम्युनिस्ट की बदौलत माननीय बने कई कम्युनिस्ट नेताओं ने बसपा का दामन थाम लिया। इनमें चंद्रभान, डॉ. सुरेंद्रपाल वर्मा और रामसजीवन मुख्य रूप से शामिल थे।

कम्युनिस्ट पार्टी का सिक्का जमाने में अहम भूमिका इस पार्टी के पुरोधा और राजनीति के भीष्म पितामह कहे जाने वाले दुर्जन भाई की रही, लेकिन यह भी अजब बात है कि आज इस नेता को कम्युनिस्ट पार्टी के अधिकांश नेताओं ने ही भुला दिया।

दुर्जन भाई ने यहां की जनता को जातीय आधार पर ज्यादा जोड़ा था। उन्होंने निचले तबके के लोगों के लिए संघर्ष करके अपनी अलग पहचान बनाई थी। उनके निधन के बाद कम्युनिस्ट पार्टी की उल्टी गिनती शुरू हुई। ब्यूरो

पिछले लोकसभा के कुछ चुनाव नतीजों पर नजर डाली जाए तो कम्युनिस्ट पार्टी का प्रदर्शन बेहद खराब रहा। पिछले वर्ष 2014 के चुनाव में कम्युनिस्ट पार्टी के रामचंद्र सरस को मात्र 15,156 वोट मिले, जो कुल मतदान के एक फीसदी से भी कम थे।

2009 के चुनाव में कम्युनिस्ट पार्टी के संतोष कुमार को मात्र 7942 वोट मिले। वर्ष 2004 के चुनाव में सीपीआई के चंद्रपाल को 12,372 और वर्ष 1999 के चुनाव में इस पार्टी के बिहारी लाल को 4290 वोट प्राप्त हुए।

1998 के चुनाव में सीपीआई के राम प्रसाद सिंह को 12,928 मत मिले। इसके पूर्व 1996 में राम प्रसाद सिंह को सीपीआई प्रत्याशी के रूप में ही 41,031 वोट मिले। 1991 में सीपीआई के रामसजीवन 67,410 वोट पाए थे, जबकि इसके पहले हुए 1989 के चुनाव में सीपीआई से ही सांसद चुने गए थे।

पार्टी की मौजूदा स्थिति पर भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी राज्य कौंसिल सदस्य डॉ. रामचंद्र सरस कहते हैं कि दलबदलुओं का जमाना बहुत ज्यादा दिन नहीं चलता। स्थितियां फिर बदलेंगी और कम्युनिस्ट पार्टी अपना पुराना रुतबा हासिल करेगी।
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