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बांदा में दोआबा क्षेत्र के गोपरा गांव में 20 दिनों से चूल्हे ठंडे

Thu, 02 Jun 2016 12:23 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, बांदा
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गोपरा गांव में भुखमरी का दंश झेल रहे ग्रामीणों का हालचाल लेते कांग्रेस नेता। - फोटो : अमर उजाला
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बांदा। समाजवादी सूखा राहत पैकेट हों या कोटे की दुकानों से गरीबों को मुफ्त या रियायती राशन बांटने की योजना। दोआबा क्षेत्र के गांवों में ये सरकारी योजनाएं सिर्फ सपना साबित हो रही हैं। यहां आज भी घरों में 20-20 दिन तक चूल्हे नहीं जल पा रहे हैं।
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भूख से बिलबिलाते बच्चों को लेकर उनकी माताएं मायके चली गई हैं। कई घरों में इकलौते बचे, बूढ़े पुरुष पड़ोसियों के रहमोकरम पर या मिड-डे मील से भूख मिटा रहे हैं। नरैनी क्षेत्र के गोपरा गांव में तंगहाली, गरीबी और फांकाकशी के हालात हैं। यहां जरूरतमंदों के लिए कोई सरकारी योजना सहारा नहीं बन पा रही है।

सूखाग्रस्त इलाकों में हर प्रभावित परिवार को मुफ्त खाद्यान्न वितरण और मनरेगा के तहत रोजगार देने के सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों पर अमल की स्थिति देखने के लिए स्वराज अभियान के संयोजक व पूर्व आप नेता योगेंद्र यादव ने एक सप्ताह की हल जल यात्रा निकाली थी। मंगलवार को महोबा में यात्रा के समापन के दौरान उन्होंने भी इस बात पर अफसोस जताया था कि इस दिशा में सरकारें गंभीर नहीं हैं। उनका निष्कर्ष है कि पीड़ित परिवारों को कहीं भी मुफ्त राशन नहीं दिया जा रहा है।
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गोपरा गांव के हालात की भनक लगने पर कांग्रेसियों का जत्था वहां पहुंच गया। फांकाकशी और तंगहाली के दौर से गुजर रहे गरीबों के दरवाजे पर दस्तक दी। उनके घरों की बदहाली कैमरे में कैद की। जत्थे का नेतृत्व कर रहे कांग्रेस प्रदेश संगठन मंत्री साकेत बिहारी मिश्र और सचिव पंकज मिश्र ने बताया कि इस गांव में मनुष्यों को रोटी और मवेशियों को भूसा के लाले हैं। यहां किसी को भी सरकारी भूसा नहीं मिला। नदी किनारे से रोजाना झाड़ियां काटकर जानवरों का पेट भर रहे हैं।

संगठन मंत्री ने बताया कि इस गांव की बदहाली की ग्राउंड रिपोर्ट कांग्रेस हाईकमान और राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग अध्यक्ष सांसद पीएल पुनिया को भेजी गई है। प्रतिनिधिमंडल में कांग्रेस नेता रावेंद्र चतुर्वेदी, रामभरोसा वर्मा, राजबहोर शिवहरे और राजाराम गौतम भी शामिल रहे।

केस-1
बांदा। अनुसूचित जाति का लक्खू उर्फ लखन धोबी बागै नदी किनारे ऊंचाई पर बनी झोपड़ी में अकेला रह रहा है। घर का चूल्हा पिछले 20 दिन से नहीं जला। घर में अनाज के एक दाना नहीं है। टूटी-फूटी गृहस्थी के चंद सामान और मैले-कुचैले कपड़े ही नजर आते हैं। लक्खू की पत्नी शकुंतला चार बच्चों की फांकाकशी का दर्द सहन नहीं कर पाई और उनको लेकर मायके छीबो (चित्रकूट) चली गई।

पड़ोसी रामकेश, जयपाल सिंह, जग प्रसाद और सुरेश ने बताया कि जो भी बन पड़ता है, लक्खू को खाने को दे देते हैं, क्योंकि उनकी खुद की हालत ऐसी नहीं है कि किसी का पेट भर सकें। लक्खू दिन भर सिर्फ अंडरवियर में भटकता रहता है। बीपीएल राशन कार्ड होने के बाद भी अनाज नहीं मिला।
केस-2
बांदा। गांव किनारे महुआ के पेड़ तले तपती जमीन पर लेटे बीमार कल्लू केवट के घर भी फांकाकशी के हालात हैं। आठ साल पहले पत्नी मर गई। इंदिरा आवास बिना छत का है। धूप और बारिश में पेड़ तले दिन काट रहा है। आए दिन फांकाकशी से त्रस्त दो लड़की और एक लड़का अपने ननिहाल टेढ़ापुरवा चले गए। अब कल्लू अकेला है। उसने बताया कि कुछ दिनों पहले कोटेदार ने गेहूं दिया था लेकिन बीमारी के चलते वह गेहूं पिसवा नहीं सका। पड़ोसी चुनूबाद पाल ने बताया कि अक्सर इसके बच्चों को रोटी देते रहे हैं लेकिन जब उनकी दुर्गति नहीं देखी गई तो ननिहाल जाने के लिए कह दिया गया।

कोट-
गोपरा गांव में लखन धोबी और कल्लू केवट व रामदास केवट के परिवारों को 35-35 किलो राशन (गेहूं-चावल) भेजा गया है। और भी ऐसे किसी परिवार के बारे में सूचना मिलेगी तो उन्हें तत्काल राशन और अन्य राहत पहुंचाई जाएगी। लेखपालों को गांवों के ऐसे परिवारों पर लगातार नजर रखने का निर्देश दिया गया है।
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-सीएल सोनकर, उप जिलाधिकारी, नरैनी
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