बांदा। ‘सूरज की रोशनी में भी लुट जाएंगे असर, खुद अपने घर की हम जो हिफाजत न करेंगे’। बज्मे इकरारिया के मुशायरे की शायर असर बांदवी ने इसी शेर से शुरूआत की। इसके पहले नात ख्वानी हुई।
बीती रात आयोजित मुशायरे में डॉ. इजहार खालिद ने शेर पढ़ा- तमाम रिंदो के साकी में जाम भर डाले, हमें न कतरा मयस्सर है क्या किया जाए। असगर बांदवी ने सुनाया- इक बार भी गिराया जिसने मुझे नजर से, गुजरा नहीं दोबारा फिर उसकी राह गुजर से। सईद वारसी का शेर था- बड़े चर्चे हैं जिनकी अजमतों के आसमानों में, बटी है कौम वो फिरको, कबीलों, खानदानों में।
शरीफ बांदवी ने पढ़ा- बनके मोनिस कभी हमदम कभी भाई यारो, लूटा मजबूर को जरदार ने कैसे-कैसे। शायर आरिफ ने सुनाया- दुनिया वालों ने कहां समझा है हमको यारो, बाखुदा हम तो पहाड़ों सा जिगर रखते हैं। मुशायरे की निजामत कर रहे हकीम बशीर तालिब ने पढ़ा- हमारी मोहब्बत की बुनियाद तुम हो, तेरे बिन अधूरी मेरी दास्तां है। अगला मुशायरा 5 जनवरी को होगा। इसके लिए मिसरह तरह- मश्अले करो रोशन दूर तक अंधेरा है।