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जांच में 32 बच्चे क्लब फुट रोगी पाए गए

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लगभग 40 फीसदी बच्चों को कुपोषण वाले बांदा जनपद में क्लब फुट (मुड़े हुए पैर) का रोग भी बढ़ रहा है। बच्चों को जन्मजात विकृतियां गिरफ्त में ले रही हैं।
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वर्ष 2018-19 में जनपद में 4697 बच्चे चिन्हित किए गए हैं। इनमें 32 बच्चे क्लब फुट रोग के पाए गए। पांच बच्चों की सर्जरी की जाएगी। स्वास्थ्य विभाग का कहना है कि समय से इलाज होने पर यह रोग ठीक हो जाता है। 27 बच्चों को प्लास्टर के माध्यम से ठीक किया जाएगा।


राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम (आरबीएसके) के मैनेजर वीरेंद्र प्रताप ने बताया कि क्लब फुट जन्मजात विकृति है। इस विकृति में बच्चे के पांव अंदर की ओर मुड़े होते हैं।
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लोग अक्सर इसे बीमारी न समझकर इलाज नहीं कराते। आगे चलकर यह स्थाई विकलांगता में बदल जाता है। उन्होंने बताया कि ऐसी बहुत सी बीमारियां हैं जो जन्मजात बच्चों को प्रभावित करती हैं।

इस वित्तीय वर्ष में बांदा जनपद में 3.13 लाख बच्चों की जांच की गई। इसमें 4697 बच्चों को चिन्हित कर उनका इलाज किया गया। इनमें 32 सर्जरी भी शामिल है।

राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के अंतर्गत वर्ष 2013 में आरबीएसके की शुरुआत की गई थी। इसके माध्यम से स्वास्थ्य की जांच व शीघ्र हस्तक्षेप सेवाओं (अर्ली इंटरवेशन सर्विसेज) के द्वारा कुपोषित व जन्मजात दोष वाले बच्चों को चिन्हित करके उनका सही इलाज किया जाता है।

उन्होंने बताया कि इस कार्यक्रम के लिए हरेक ब्लाक में दो-दो टीमें गठित की गई हैं। ये टीमें आंगनबाड़ी केंद्रों और सहायता प्राप्त स्कूलों में बच्चों का स्वास्थ्य परीक्षण करती हैं।

चिन्हित बच्चों का मेडिकल कालेज, जिला अस्पताल या सीएचसी में मुफ्त इलाज किया जाता है। जरूरत पड़ने पर कानपुर या लखनऊ के बड़े अस्पतालों में रेफर किया जाता है।


आरबीएसके मेडिकल आफीसर (जसपुरा ब्लाक) डा. अंकुर अवस्थी ने बताया कि ज्यादातर गर्भवती महिलाएं गर्भावस्था के दौरान आयरन गोलियों का इस्तेमाल नहीं करतीं।

इसका असर उनके होने वाले बच्चे पर पड़ता है। इससे सिर्फ क्लब फुट ही नहीं बल्कि जितनी भी जन्मजात रोग व विकलांगता है उनको आयरन की कमी से दूर किया जा सकता है।
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क्लब फुट के मरीज बच्चों को राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के साथ मिलकर एक कंपनी मुफ्त काउंसलिंग व ब्रेथलेस सुविधा प्रदान कर रही है।

संस्था के कार्यक्रम अधिकारी आशीष मिश्रा हर बुधवार को जिला अस्पताल में आर्थोपेडिक सर्जन के साथ क्लब फुट के केस देखते हैं। मिरेकल फीट इंडिया के अनुसार उत्तर प्रदेश में हर साल सात हजार बच्चे क्लब फुट के साथ पैदा होते हैं।

इसका इलाज कम उम्र में ही ज्यादा प्रभावशाली होता है। सर्जरी की जरूरत नहीं पड़ती।
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