व्यापारी हिमांशु कसौधन ने कहा कि जिस तरह अब आवाज बुलंद हुई है, उसे आगे बढ़ाने के लिए सभी एकजुट हो रहे हैं। व्यापार मंडल के अध्यक्ष श्याम बिहारी ने नेपाल के व्यापारियों से फोन पर वार्ता की। जिले में चल रहे प्रयास की जानकारी दी और अमर उजाला की खबरों के बारे में बताया। ऑनलाइन लिंक भेजते हुए कहा कि नेपाल में भी ऐसी ही पहल हो। इसके साथ ही व्यापारियों के साथ बैठककर नेपाल जाने की रणनीति बनाई।
व्यापारियों ने बताया कि कोयलाबास से लेकर त्रिभुवन बाजार तक पहले भारत से डीजल-पेट्रोल, बर्तन, नमक, चीनी, मैदा और खाद्यान्न वस्तुएं जाती थीं। मगर राजनीतिक तनातनी और माओवादी घटनाओं के बाद नेपाल सरकार ने कृष्णानगर, बुटवल, पोखरा, काठमांडू और नेपालगंज जैसी बड़ी मंडियों पर ध्यान केंद्रित कर लिया। भारत की ओर से जरवा बाजार को बचाने के लिए कोई ठोस प्रयास नहीं हुआ। नतीजतन व्यापार ठप हो गया। जरवा के मकान आज खंडहर बनकर खामोश गवाही दे रहे हैं। इसी तरह मणिपुर और बरदौलिया बाजार के व्यापारी भी उत्साहित हैं। उनका कहना है कि भंसार की सीमा बढ़ने से नियमित व्यापार बढ़ेगा।
टूटे सपनों को जोड़ने की नहीं हो सकी पहल
भारत-नेपाल सीमा के जरवा और कोयलाबास बाजार में वर्ष 1985 तक रौनक रही। जरवा के विशंभर यादव ने बताया कि यहां भारत-नेपाल के बीच व्यापार चरम पर था, लेकिन राजनीतिक उथल-पुथल, माओवादी गतिविधियों और दोनों देशों की नीतिगत उपेक्षा ने इस व्यापारिक केंद्र को पूरी तरह ध्वस्त कर दिया। इसके बाद से हजारों लोग यहां से पलायन कर गए। बड़ी संख्या में अब भी लोग तुलसीपुर, बलरामपुर, गोंडा, दांग, घोड़ाही, कृष्णा नगर और अन्य शहरों में रहकर कारोबार कर रहे हैं। व्यापारी बबलू ने कहा कि अब एक उम्मीद की किरण जगी है। जल्द ही व्यापारिक रिश्ते फिर प्रगाढ़ होने से दोनों देशों की अर्थव्यवस्था मजबूत होगी। तराई के विकास के लिए जरूरी है कोयलाबास बॉर्डर से भंसार की सीमा बढ़ाई जाए।