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Balrampur News: 29 साल में बदली तस्वीर, फिर भी विकास की कई सौगातें बाकी

Sun, 24 May 2026 10:37 PM IST
लखनऊ ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, बलरामपुर
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फोटो-28- बलरामपुर में बना मेडिकल कॉलेज। संवाद
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संजय तिवारी
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बलरामपुर। 25 मई 1997 को गोंडा जिले से अलग होकर अस्तित्व में आया नेपाल सीमावर्ती बलरामपुर आज अपने गठन के 29 वर्ष पूरे कर रहा है। तराई की मिट्टी, भगवान बुद्ध की विरासत, देवीपाटन की आस्था और गन्ने की खुशबू से पहचाने जाने वाले इस जिले ने इन वर्षों में विकास की लंबी यात्रा तय की है। सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य, बिजली और पर्यटन के क्षेत्र में कई बदलाव हुए हैं, लेकिन सीमांत जिले की पहचान से जुड़ी कई चुनौतियां आज भी जस की तस बनी हुई हैं।
जिले के गठन के समय यहां बुनियादी सुविधाओं का भारी अभाव था। गांवों तक पक्की सड़कें नहीं थीं, स्वास्थ्य सेवाएं बेहद कमजोर थीं और शिक्षा का स्तर भी चिंताजनक था। नेपाल सीमा से सटे इस जिले को लंबे समय तक पिछड़े इलाके के रूप में देखा जाता रहा। केंद्र सरकार ने भी जिले को देश के पिछड़े जिलों में शामिल किया। पिछले डेढ़-दो दशक में जिले की सड़क और बिजली व्यवस्था में सबसे बड़ा बदलाव देखने को मिला।
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पहले जहां तुलसीपुर, पचपेड़वा और गैसड़ी क्षेत्र तक पहुंचना मुश्किल माना जाता था, वहीं अब प्रमुख मार्गों का चौड़ीकरण हुआ है। गांवों तक बिजली पहुंची और बाजारों में व्यावसायिक गतिविधियां बढ़ीं। नेपाल सीमा से जुड़े क्षेत्रों में सुरक्षा और संपर्क व्यवस्था भी पहले की तुलना में मजबूत हुई है। जिले के कई हिस्सों में पुल और संपर्क मार्ग बनने से लोगों की आवाजाही आसान हुई है। जिले में 20 इंटर कॉलेज और चार डिग्री कॉलेजों की संख्या बढ़ी है।
मां पाटेश्वरी विश्वविद्यालय की स्थापना ने नया मुकाम दिया। एमएलके पीजी कॉलेज समेत कई शिक्षण संस्थानों ने जिले के युवाओं को नई दिशा दी। मेडिकल कॉलेज की स्थापना ने भी लोगों में बेहतर स्वास्थ्य सेवाओं की उम्मीद जगाई। हालांकि जमीनी हकीकत अभी पूरी तरह संतोषजनक नहीं है। मेडिकल कॉलेज का भवन बनने के बाद भी विशेषज्ञ डॉक्टरों की कमी और संसाधनों की अव्यवस्था लगातार सवाल खड़े कर रही है। जिला अस्पताल की हालत अक्सर चर्चा में रहती है।
जिले की पहचान सिर्फ सीमावर्ती जिले के रूप में नहीं, बल्कि धार्मिक और सांस्कृतिक धरोहर के रूप में भी मजबूत हुई है। तुलसीपुर स्थित शक्तिपीठ देवीपाटन मंदिर और श्रावस्ती से जुड़ा बौद्ध पर्यटन क्षेत्र देश-विदेश के श्रद्धालुओं और पर्यटकों को आकर्षित करता है। युवा चिंतक सुरेंद्र बहादुर कहते हैं कि पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए सड़क और होटल सुविधाओं में कुछ सुधार हुए हैं, लेकिन अभी भी जिले में पर्यटन आधारित रोजगार की व्यापक संभावनाएं अधूरी हैं। कृषि अब भी अर्थव्यवस्था की रीढ़

तराई क्षेत्र होने के कारण जिले की अर्थव्यवस्था आज भी कृषि पर आधारित है। गन्ना, धान और गेहूं यहां की प्रमुख फसलें हैं। बलरामपुर चीनी मिल जैसी बड़ी इकाइयों ने किसानों और स्थानीय रोजगार को सहारा दिया है। इसके बावजूद जिले में बड़े उद्योगों का अभाव बना हुआ है। युवा रोजगार के लिए लखनऊ, गुजरात, पंजाब और दिल्ली जैसे शहरों की ओर पलायन करने को मजबूर हैं। शहर के डीपी सिंह कहते हैं कि जिले की चीनी मिल ने रोजगार के अवसर दिए हैं, पहले विकास की रफ्तार सुस्त थी। वर्ष 2017 के बाद तेज हुई। सिविल लाइन की ललिता सिंह ने कहा कि फुलवरिया बाईपास, बौद्ध परिपथ, थारु संग्रहालय और देवीपाटन तीर्थ विकास बोर्ड से आने वाले दिनों में जिले को ऊंचाई मिलेगा।
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बाढ़ का निदान हो तो बात बने
बाढ़ और जलभराव की समस्या हर साल तराई क्षेत्र के लोगों की मुश्किलें बढ़ाती है। नेपाल सीमा से सटे कई गांवों में आज भी आधुनिक सुविधाओं का अभाव है। पर्यटन, कृषि आधारित उद्योग और मेडिकल सुविधाओं को मजबूत कर ही जिले को वास्तविक विकास की मुख्यधारा में लाया जा सकता है। सेवानिवृत्त पीसीएस अधिकारी केके वर्मा कहते हैं कि जिले ने 29 वर्षों में अपनी पहचान जरूर बदली है, लेकिन सीमांत जिले के सपनों को पूरी उड़ान अभी बाकी है।
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