बलरामपुर। श्रावस्ती संसदीय सीट पर सपा ने शानदार जीत दर्ज कर राजनीतिक पंडितों के कयासों को सिरे से खारिज कर दिया। सपा-कांग्रेस गठबंधन का मौजूदा बसपा सांसद राम शिरोमणि वर्मा को प्रत्याशी बनाने का दांव काम कर गया। भाजपा प्रत्याशी साकेत मिश्र का समीकरण साधने के लिए चले सारे पैंतरे सियासी मैदान में टिक नहीं सके। सपा ने पहले ही राउंड से लीड की शुरुआत की, जो हर राउंड में बढ़ती रही, बीच में नौवें व दसवें राउंड में जीत के अंतर में आंशिक गिरावट दर्ज की गई, लेकिन अगले ही राउंड में फिर जीत के अंतर को बढ़ाने में सफल रही।
अंबेडकरनगर से चल कर वर्ष 2019 में श्रावस्ती संसदीय सीट से सपा गठबंधन में बसपा प्रत्याशी के तौर पर राम शिरोमणि वर्मा ने महज 5,320 मताें से जीत दर्ज की थी। उस समय राम शिरोमणि वर्मा को 4,41,771 व भाजपा के दद्दन मिश्र को 4,36,451 मत हासिल हुए थे। उस समय कांग्रेस से पूर्व विधायक धीरेंद्र प्रताप सिंह भी मैदान में थे और उन्हें 58,042 मत मिले थे। साल 2019 के परिणाम से यह माना गया था कि कांग्रेस प्रत्याशी ने भाजपा को नुकसान किया। इससे मामूली मतों के अंतर से गठबंधन प्रत्याशी ने जीत दर्ज की। इस बार बसपा ने मुईनुद्दीन अहमद खां उर्फ हाजी दद्दन खां को प्रत्याशी बनाया। जिनसे सपा-कांग्रेस गठबंधन को नुकसान होने का अनुमान लगाकर भाजपा में उत्साह रहा। इसके साथ ही भाजपा ने मंडल की श्रावस्ती सीट पर सबसे अधिक जोर भी लगाया। परिस्थितियां विपरीत होने के बाद भी सपा पूरे आत्मविश्वास में रही कि यहां जीत दर्ज की जा सकती। इसी के आधार पर पिछड़ा, अल्पसंख्यक और दलित मतदाताओं को साधने का दांव तो चला ही साथ ही बहुत सधे तरीके से सवर्ण मतदाताओं को भी पाले में लाने की कोशिश की। इसी का परिणाम रहा कि सपा को देवीपाटन मंडल में बड़ी जीत मिली।
श्रावस्ती ने बनाए तीन रिकाॅर्ड
संसदीय चुनाव के परिणाम से श्रावस्ती ने जहां एक साथ तीन रिकाॅर्ड बनाए, वहीं दिग्गजों के दांव को किनारे करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। एक तो साल 2009 में नवगठित श्रावस्ती संसदीय सीट ने कभी दोबारा मौका किसी को नहीं दिया था, इस बार दूसरी बार मौजूदा सांसद को जिताकर एक नया रिकाॅर्ड बनाया। साल 2009 में कांग्रेस के विनय कुमार पांडेय, 2014 में भाजपा के दद्दन मिश्र व साल 2019 में बसपा के राम शिरोमणि वर्मा को श्रावस्ती ने देश के सबसे बड़ी पंचायत में भेजा। लेकिन दोनों दूसरी बार चुनाव जीत नहीं सके। जबकि 2009 में विनय पांडेय और 2019 में दद्दन मिश्र ने दोबारा किस्मत अजमाई थी। इसके अलावा सपा को पहली बार संसदीय चुनाव में जीत दिलाकर सभी पार्टियों को मौका देने का भी रिकॉर्ड बनाया। यही नहीं तीसरा रिकाॅर्ड यह रहा कि पूरे मंडल में सत्तापक्ष को जीत मिली, लेकिन श्रावस्ती ने फिर बागी रवायत कायम रखते हुए भाजपा के बजाए सपा के प्रत्याशी को जिताया। इसके पहले साल 2014 में केंद्र की सत्तापक्ष कांग्रेस प्रत्याशी को हार व भाजपा को जीत मिली थी, साल 2019 में भाजपा के विपक्षी गठबंधन के प्रत्याशी को जिताया। इसी तरह इस बार भी विपक्ष के ही प्रत्याशी को चुनकर अपनी पुरानी रवायत कायम रखी।
हवा में ही रहा लापता सांसद का मुद्दा
साल 2019 में बसपा से चुनाव जीतने के बाद सांसद राम शिरोमणि वर्मा की क्षेत्र में कम उपलब्धता को लेकर भाजपा ने बड़ा मुद्दा बनाया था। आम लोगों में इस मामले पर खासी नाराजगी रही, लेकिन राम शिरोमणि ने एन वक्त पर सपा का दामन थामकर एक बड़े वोट बैंक को अपने पाले में ले लिया। चुनाव में सांसद राम शिरोमणि के कभी न आने की बात को जन- जन के बीच प्रचारित किया गया। लेकिन यह मुद्दा हवा में ही बना रहा है। सांसद राम शिरोमणि ने श्रावस्ती के कटरा में अपना निज निवास बनाकर यह साबित करने में सफल रहे कि वह जनता के बीच में रहे हैं। माना जा रहा है कि राम शिरोमणि कैडर मतदाताओं तक बराबर बने रहे और यह उनके काम भी आया।