गैसड़ी। खरीफ सीजन में सामान्य से कम वर्षा के बीच कृषि वैज्ञानिक किसानों को कम पानी में अधिक लाभ देने वाली फसलों की ओर बढ़ने की सलाह दे रहे हैं। इसी क्रम में कृषि विज्ञान केंद्र (केवीके) पचपेड़वा ने थारू जनजाति बहुल ग्राम भूशहर पुरई में तिल की उन्नत उत्पादन तकनीक पर जोर दिया। यहां आयोजित एक दिवसीय प्रशिक्षण में 50 किसानों को आरटी-372 किस्म के तिल के बीज निशुल्क वितरित किए गए।
कार्यक्रम में कृषि वैज्ञानिकों ने बताया कि धान की तुलना में तिल कम लागत, कम सिंचाई और कम अवधि में तैयार होने वाली लाभकारी नकदी फसल है। यह फसल 75 से 85 दिनों में तैयार हो जाती है और नीलगाय सहित अन्य जंगली जानवरों से भी अपेक्षाकृत सुरक्षित रहती है। ऐसे में कम वर्षा की स्थिति में यह किसानों के लिए एक बेहतर विकल्प बन सकती है।
केवीके के प्रभारी डॉ. सियाराम ने किसानों को जुलाई के प्रथम सप्ताह में बोआई करने की सलाह दी। उन्होंने बताया कि पंक्ति से पंक्ति की दूरी 30 से 45 सेंटीमीटर तथा पौधे से पौधे की दूरी 10 से 15 सेंटीमीटर रखनी चाहिए। साथ ही बीज को तीन से चार सेंटीमीटर से अधिक गहराई पर न बोने की हिदायत दी। उन्होंने कहा कि तिल की फसल में सिंचाई की आवश्यकता भी बहुत कम होती है।
मृदा वैज्ञानिक डॉ. जगवीर सिंह ने संतुलित उर्वरक के प्रयोग पर जोर दिया, जबकि पादप रोग वैज्ञानिक डॉ. गिरिजेश कुमार जायसवाल ने फसल को रोगों एवं कीटों से बचाव के उपायों की जानकारी दी।
किसानों में दिखा उत्साह, मिली नई उम्मीद
प्रशिक्षण में शामिल किसान लड्डन ने बताया कि लगातार कम बारिश के कारण धान की खेती को लेकर चिंता बढ़ गई थी। ऐसे में तिल जैसी कम पानी वाली फसल की जानकारी और निशुल्क बीज मिलने से उन्हें नई उम्मीद मिली है। किसान राम संवारे ने कहा कि यदि उत्पादन अच्छा रहा तो अगले वर्ष वे अधिक क्षेत्रफल में तिल की खेती करेंगे, क्योंकि इसमें लागत कम और मुनाफे की संभावना अधिक है। कार्यक्रम में कल्लू, रमेश, मुन्नी देवी, मायावती, प्रेम कुमारी, ओमप्रकाश सहित कई थारू किसान मौजूद रहे।