यूपी पुलिस, एटीएस और साइबर सेल से जुड़े अफसरों का मानना है कि नेटवर्क की जड़ तक पहुंचने के लिए केंद्रीय एजेंसियों की मदद जरूरी होगी। प्रारंभिक जांच में सामने आया है कि सस्पियर का गिरोह सोशल मीडिया, ईमेल स्कैम और फर्जी वेबसाइट के जरिए लोगों को झांसे में लेकर साइबर ठगी करता था। गिरोह के तार सीधे कराची और लाहौर से जुड़े हैं।
फंडिंग के तीन माध्यम
हवाला : दिल्ली, मुंबई, कोलकाता और नेपाल बॉर्डर के रास्ते रकम भेजने के साक्ष्य मिले हैं।
क्रिप्टो करेंसी : बिटकॉइन और ट्रॉन जैसी डिजिटल करेंसी का उपयोग कर पैसे को ट्रैक से बाहर रखने की कोशिश।
फर्जी बैंक अकाउंट : गिरोह ने आधार और पैन कार्ड की जालसाजी कर देशभर में करीब 200 फर्जी खाते खुलवाए।
अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा को खतरा
जांच एजेंसियों को संदेह है कि टेरर फंडिंग का नेटवर्क केवल आर्थिक अपराधों तक सीमित नहीं है। इसके जरिए देश में राजनीतिक और सामाजिक अस्थिरता फैलाने की कोशिश भी हो सकती है। इनपुट मिला है कि कुछ फंड का इस्तेमाल फेक न्यूज, धार्मिक उन्माद भड़काने और सरकारी संस्थानों को निशाना बनाने के लिए भी हुआ है।
अब तक की कार्रवाई
-गिरोह के पांच प्रमुख सदस्यों की गिरफ्तारी
-16 फर्जी खाते फ्रीज
-एक मोबाइल, लैपटॉप, और 15 फर्जी दस्तावेज बरामद
-विदेशी ट्रांजेक्शन को ट्रैक करने के लिए विशेष पुलिस जांच टीम बनी
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सुरक्षा तंत्र के लिए है बड़ी चुनौती
-सेवानिवृत्त पुलिस अधिकारी अशोक कुमार बताते हैं कि साइबर ठगी के मामलों का अंतरराष्ट्रीय कनेक्शन सामने आना और पाकिस्तान से लिंक जुड़ना सुरक्षा तंत्र के लिए बड़ी चुनौती है। इस प्रकरण से यह स्पष्ट होता है कि अब देश के भीतर साइबर सुरक्षा और आर्थिक लेनदेन पर और कड़ी निगरानी की जरूरत है।