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Balrampur News: संपादकीय और भाषण को साहित्य में मिली विधा की मान्यता

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बलरामपुर। हिंदी साहित्य में एक नया अध्याय जुड़ गया है। मां पाटेश्वरी विश्वविद्यालय ने देश के विश्वविद्यालयों में पहली बार ‘संपादकीय’ और ‘भाषण’ को साहित्य की विधा के रूप में मान्यता दी है। विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग ने इन दोनों विधाओं को परास्नातक पाठ्यक्रम में शामिल कर इतिहास रच दिया है। हिंदी अध्ययन समिति के पूर्व संयोजक डॉ. शैलेंद्र नाथ मिश्र ने बताया कि विभाग ने पूरा पाठ्यक्रम तैयार कर लागू कर दिया है। आने वाले सत्रों में इन दोनों विधाओं पर शोध और उच्च अध्ययन की भी संभावनाएं खोली जाएंगी।
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अब तक संपादकीय और भाषण को हिंदी साहित्य की विधा नहीं माना जाता था, जबकि दोनों का भारतीय जनजीवन, समाज और विचारधारा के विकास में अहम योगदान रहा है। विश्वविद्यालय की इस पहल को साहित्य जगत में एक विचारात्मक क्रांति के रूप में देखा जा रहा है। इस पहल से युवाओं में विचारशील लेखन और सार्वजनिक अभिव्यक्ति की दिशा में नई ऊर्जा आएगी।
विशेषज्ञों का कहना है कि संपादकीय केवल समाचार नहीं, बल्कि समाज की चेतना का आईना होता है, वहीं भाषण संवाद का सशक्त माध्यम है। विश्वविद्यालय की इस पहल से युवा न सिर्फ इन विधाओं में दक्ष होंगे, बल्कि समाज और राष्ट्र के प्रति अपनी जिम्मेदारी भी समझ सकेंगे। विश्वविद्यालय से संबद्ध 171 महाविद्यालयों में यह पाठ्यक्रम लागू किया गया है। (संवाद)
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विधाओं को पहली बार मिला स्थान
हिंदी साहित्य में अब तक लगभग 40 विधाओं को स्थान दिया गया था। इसमें नाटक, जीवनी, संस्मरण, फीचर, निबंध आदि शामिल हैं, लेकिन संपादकीय और भाषण, जो समाज की विचारधारा को दिशा देते हैं, उन्हें विधा के रूप में मान्यता नहीं मिली थी, जबकि यह विधा दोनों काफी पुराने समय से है। मां पाटेश्वरी विश्वविद्यालय ने इस कमी को पूरा करते हुए दोनों को पाठ्यक्रम का हिस्सा बना दिया है। प्रोफेसरों और शोधार्थियों ने इस निर्णय का स्वागत किया है। उनका कहना है कि अब हिंदी साहित्य का अध्ययन अधिक समकालीन, व्यावहारिक और जनजीवन से जुड़ा होगा। विश्वविद्यालय की यह पहल आने वाले समय में देशभर के विश्वविद्यालयों के लिए आदर्श मॉडल साबित हो सकती है।
अब पढ़ाया जाएगा ‘शब्द और कर्म’ व ‘शताब्दी का अवसान’
मां पाटेश्वरी विश्वविद्यालय द्वारा तैयार पाठ्यक्रम में काफी मशक्कत करके विषयों को शामिल किया है, जिसमें संपादकीय विधा के अंतर्गत प्रसिद्ध साहित्यकार और विचारक डॉ. विश्वनाथ प्रसाद तिवारी (पूर्व विभागाध्यक्ष, गोरखपुर विश्वविद्यालय व पूर्व उपाध्यक्ष, साहित्य अकादमी, नई दिल्ली) का प्रसिद्ध संपादकीय “शब्द एवं कर्म” शामिल किया गया है। वहीं भाषण विधा के अंतर्गत हिंदी के प्रख्यात आलोचक प्रोफेसर नामवर सिंह का ऐतिहासिक भाषण “शताब्दी का अवसान और उत्तर आधुनिकता”, जो उन्होंने भोपाल स्थित भारत भवन में दिया था, को जोड़ा गया है।
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