तुलसीपुर (बलरामपुर)। कहते हैं जहां चाह होती है वहां राह जरूर मिलती है। कुछ इसी तरह की कहानी गैड़हवा व आसपास के गांव में रहने वाले सैकड़ों परिवारों की भी है। यह लोग रोजगार के लिए पलायन नहीं करते। यह परिवार घर पर ही बांस से पतंग की तीलियां बनाते हैं। ये तीलियां बड़े-बड़े शहरों के अलावा गुजरात तक भेजी जाती हैं। इस धंधे को यदि सरकारी सुविधा मिले तो बेरोजगारों के लिए प्रेरणास्रोत बन सकता है।
इन गांवों में होता है कारोबार
पतंग की तीली बनाने का काम तुलसीपुर तहसील क्षेत्र के ग्राम गैड़हवा, मध्यनगर, बिलोहा, बनकसिया, सुखरामपुर, गोपालपुर, मनकौरा काशीराम तथा हरहटा सहित आस पास के अन्य गांवों में भी होता है। इन गांवों के सैकड़ों परिवार बांस खरीदकर पतंग की तीली बनाते हैं।
150-300 रुपये होती है प्रतिदिन आय
पतंग की तीली बनाने में लगे परिवार के एक सदस्य की प्रतिदिन औसतन आय 150 से 300 रुपये तक हो जाती है। खेती बाड़ी आदि के साथ-साथ लोग इस व्यवसाय से अतिरिक्त कमाई करते हैं। इसीलिए इन परिवारों के लोग रोजगार के लिए बड़े शहरों की तरफ भी पलायन नहीं करते।
पहले असम से आता था बांस
करीब आठ दशक से पतंग की तीली का कारोबार करने वाले बुजुर्ग बताते हैं कि पहले तीलियां बनाने के लिए बांस असम प्रांत से ट्रेन से आता था। अब बांस की पूर्ति आसपास के गांवों व पड़ोसी जनपदों से हो जाती है। हालांकि पूर्व की अपेक्षा अब यह कारोबार कम हो गया है।
नहीं मिलती है सरकार से कोई मदद
पतंग की तीली बनाने का काम कर रहे शंकर, बाबूलाल, प्रदीप कुमार यादव तथा हीरालाल आदि का कहना है कि हम लोगों को इस काम के लिए सरकार से कोई मदद नहीं मिलती है। यदि सरकार ध्यान दे तो हम लोग पतंग की तीलियों के साथ-साथ बड़े पैमाने पर पतंग भी बना सकते हैं। इससे हमारी आमदनी में काफी इजाफा हो जाएगा। इन लोगों ने शासन-प्रशासन से मांग की है कि क्षेत्र में बांस की खेती को प्रोत्साहन देने के साथ इस कारोबार को यदि आधुनिकता दी जाए तो कई बेरोजगारों को रोजगार भी मिल सकता है।
दी जाएगी सरकारी मदद
पतंग की तीली बनाने वालों को स्वयं सहायता समूह का गठन कर सरकारी मदद दी जाएगी। इनके व्यवसाय को और व्यापक करने के लिए शासन को पत्र भी लिखा जाएगा।
- कृष्णा करूणेश, डीएम बलरामपुर