गैड़ास बुजुर्ग थाने के सामने अनुसूचित जाति के युवक राम बुझारत के आत्मदाह का आरोपी दरोगा पवन कुमार कनौजिया की मुश्किलें बढ़ती जा रहीं हैं। शासन से अभियोजन स्वीकृति मिलने के बाद उसके खिलाफ चार्जशीट दाखिल करने की तैयारी तेज हो गई है। मामले की विवेचना अपर पुलिस अधीक्षक गोंडा राधेश्याम राय को सौंपी गई है।
करीब 14 महीने से ठंडे बस्ते में पड़ी जांच को अब रफ्तार मिली है। शासन ने 24 अक्तूबर को दरोगा के खिलाफ मुकदमा चलाने की अनुमति पुलिस विभाग को दी थी। कार्रवाई रिपोर्ट भी हाईकोर्ट में दाखिल कर दी गई। तीन नवंबर को सुनवाई के दौरान कोर्ट ने कहा कि मामले को और लटकाने की गुंजाइश नहीं है। चार्जशीट जल्द पेश करें।
पुलिस के कब्जे से टूटा था राम बुझारत का मनोबल
23 अक्तूबर 2023 को गैड़ास बुजुर्ग थाने के सामने की जमीन पर पुलिस ने कब्जा कर लिया था। इससे क्षुब्ध राम बुझारत ने थाने के सामने ही खुद पर पेट्रोल उड़ेलकर आग लगा ली। गंभीर रूप से झुलसे राम बुझारत को इलाज के लिए लखनऊ मेडिकल कॉलेज में भर्ती कराया गया, जहां 27 अक्तूबर को उन्होंने दम तोड़ दिया। उनकी मौत से क्षेत्र में आक्रोश फैल गया। आरोप था कि थाने के तत्कालीन प्रभारी पवन कुमार कनौजिया ने विवादित जमीन पर कब्जा कराया था, जो राम बुझारत के जीवनयापन का सहारा थी। इस घटना ने प्रशासन और पुलिस की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठे थे।
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मजिस्ट्रेट जांच में भी दरोगा पाया गया दोषी
-घटना के बाद तत्कालीन जिलाधिकारी अरविंद सिंह ने मजिस्ट्रेटी जांच कराई। जांच में दरोगा पवन कनौजिया को दोषी ठहराया गया। जिलाधिकारी ने पाया कि पुलिस ने अपनी ताकत का दुरुपयोग करते हुए गरीब दलित परिवार की जमीन पर कब्जा किया, जिससे पीड़ित ने निराशा में आत्मदाह कर लिया। पत्नी कुसुमा देवी की याचिका पर हाईकोर्ट ने मामले को गंभीरता से लिया और विशेष जांच दल (एसआईटी) गठित करने का आदेश दिया। जून 2023 में एसआईटी ने रिपोर्ट सौंपी, जिसमें यह पुष्टि हुई कि तत्कालीन थानाध्यक्ष की सीधी भूमिका थी। इसी रिपोर्ट के आधार पर दरोगा को नामजद किया गया, लेकिन मुकदमा चलाने की स्वीकृति न मिलने से चार्जशीट दाखिल नहीं की जा सकी।
दरोगा को बचाने की हर कोशिश हुई नाकाम
-बहुचर्चित मामले में पुलिस महकमे ने शुरुआत से ही आरोपी दरोगा को बचाने की हर कोशिश की। आत्मदाह की घटना के बाद उतरौला सीओ की रिपोर्ट पर तत्कालीन एसपी ने जिलाधिकारी को रिपोर्ट भेजी, जिसमें मृतक की पत्नी कुसुमा देवी को ही जमीन कब्जे का दोषी बताया गया और मजिस्ट्रेट स्तर की जांच की सिफारिश की गई, लेकिन तत्कालीन जिलाधिकारी अरविंद सिंह ने जांच में पुलिस के आरोपों को निराधार पाया। उन्होंने अपनी रिपोर्ट में लिखा कि दरोगा ने ही जमीन पर कब्जा कराया था। जिलाधिकारी ने इस पर तत्कालीन एसपी से जवाब-तलब भी किया कि गलत रिपोर्ट क्यों भेजी गई। इसी प्रकरण के बाद दोनों अफसरों में विवाद बढ़ा और शासन ने दोनों का स्थानांतरण कर दिया।
एक्सपर्ट कमेंट
जिलाधिकारी की रिपाेर्ट
पर ही कर देनी चाहिए थी कार्रवाई
-राम बुझारत मामले में कार्रवाई में देरी पुलिस की लापरवाही उजागर करती है। असल में जब जिलाधिकारी के स्तर से मजिस्ट्रेट की जांच रिपोर्ट दी गई थी, तो उसी समय कार्रवाई करनी चाहिए थी। पीड़ित को हाईकोर्ट तक जाना पड़ा, इसके बाद अभियोजन की स्वीकृति हुई है। यह चौंकाने वाला है। इसमें तो पुलिस अधिकारियों की भूमिका की अलग से जांच होनी चाहिए।
राम बहादुर, पूर्व जिलाधिकारी गोंडा