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Balrampur News: राम मंदिर आंदोलन को एक किताब ने दी थी धार

Mon, 08 Jan 2024 11:52 PM IST
लखनऊ ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, बलरामपुर
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बलरामपुर। आजादी के बाद अयोध्या में प्रभू श्रीराम जन्म मुक्ति आंदोलन को धार जिले से प्रकाशित हुई किताब ने दी थी। शहर निवासी किरन सिंह ने साल 1990 में श्रीराम जन्मभूमि का प्रामाणिक इतिहास नाम से वर्ष 1990 में इस किताब का प्रकाशन कर राम जन्म भूमि से जुड़े पूरे आंदोलन को एक नई दिशा देने का काम किया था।
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आजादी के बाद जन्मभूमि की मुक्ति के लिए महाराज पाटेश्वरी प्रसाद सिंह ने साल 1949 में सबसे पहले अभियान शुरू किया था। जिले के गोपाल सिंह पहले ऐसे व्यक्ति थे, जिन्हाेंने 1950 में याचिका दाखिल कर विवादित स्थल पर पूजा का अधिकार प्राप्त कर इतिहास रचा था। साल 1990 में इतिहास से परास्नातक किरन सिंह ने कारसेवा आंदोलन को आगे बढ़ाने में अपना योगदान देकर एक मिसाल कायम की थी।
इस दौरान उन्होंने अपनी आवाज एक किताब के माध्यम से बुलंद की। किताब के माध्यम से उन्होंने देश के कोने- कोने तक भगवान श्रीराम जन्मभूमि के बारे में श्रेतायुग, द्वापर युग के साथ ही राजा विक्रमादित्य के समय की जानकारी एकत्रित कर पहुंचाई। पुस्तक में मुगलकाल से अंग्रेजी शासन के साथ ही उस समय तक हुए संघर्षों की गाथा को भी प्रमाण के साथ पेश किया गया। इससे लोगों में जोश बढ़ा और कारसेवा के लिए महाराष्ट्र व अन्य राज्यों से आए कारसेवक पुस्तक की लेखिका किरन सिंह से मिलने बलरामपुर तक आए। - संवाद
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किताब में त्रेतायुग में राम जन्म के साथ ही द्वापर युग में सूर्यवंश की 44 वीं पीढ़ी के बाद महाराज बृहदल के समय के मंदिर का संस्मरण भी दर्ज है। इसमें बौद्धकाल के मंदिर की स्थिति के साथ ही रामनवमी पर वृक्ष के नीचे होने वाले विशेष उत्सव का जिक्र भी किया गया। पुस्तक में ईसा से एक शताब्दी पूर्व राम जन्म भूमि को गिराने और एक दशक पूर्व राजा विक्रमादित्य द्वारा किए गए अयोध्या उद्धार का जिक्र भी किया गया। 11 वीं शताब्दी में कन्नौज के राजा जयचंद की करतूत के साथ ही 14 वीं शताब्दी से शुरू हुए जन्मभूमि के लिए संघर्ष की कहानी से भी आंदोलन के प्रति लोगों का उत्साह बढ़ता है।
रामजन्मभूमि आंदोलन में दो नाम ऐसे हैं जो बड़े संदेश देते हैं, लेकिन कम लोगों को ही इसकी जानकारी है। किरन सिंह ने अपनी पुस्तक में उल्लेख किया है कि तुजुक बाबरी में स्वयं बाबर ने लिखा कि अकेले ही पंडित देवी दयाल ने सात सौ सैनिकों का वध किया था। अमर शहीद के बारे में लिखा कि सनेथू गांव के सूर्यवंशीय पुरोहित देवीदयाल पांडेय ने जन्मभूमि की रक्षा के लिए दस हजार सैनिकों के साथ मीर बांकी से सामना किया और धोखे से उनकी हत्या कर दी गई।
इसी तरह 1857 में बहादुरशाह जफर के समय मुसलमानों के नेता अमीर अली खां ने अयोध्या के मुसलमानों से एकत्र कर हिंदू- मुसलमानों को एक ही मां की दो संतान होने का वास्ता देकर श्रीराम चंद्र के पैदाइशी जगह को हिंदुओं को सौंपने के लिए राजी कर लिया था। लेकिन अंग्रेजों ने अमीर अली व बलवाई बाबा रामचरण दास को फांसी पर लटका दिया। इस किताब ने कारसेवा के प्रति लोगों का उत्साह बढ़ाने के साथ ही हिन्दू मुस्लिम सौहार्द भी कायम रखने में अनूठी सफलता पाई।

लेखिका किरन ने बताया कि जब भगवान श्रीराम के काम के लिए पूरा देश आगे आ रहा था। उस समय जरूरत थी तो लोगों को तथ्यों से जागरूक करने की। कई जिलों के गजेटियर को पढ़ने व इतिहास को खंगालने के बाद इस किताब को लिखा गया। इसे आज भी लोग सहेजकर अपने पास रखे हैं।
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किरन सिंह, लेखिका श्रीराम जन्मभूमि का प्रामाणिक इतिहास
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