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कुछ भी हो जाए अब दोबारा नहीं जाएंगे परदेश-

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बैरिया। गैर प्रांतों से आए प्रवासी मजदूरों को खाने के लाले पड़ने के बाद उन्होंने अपने अपने घरों से खाते में पैसा मंगवाकर कुछ दिनों तक काम चलाया। पैसा समाप्त होने के बाद धीरे धीरे उनका हिम्मत हारता चला गया। अंत में मजदूरों ने पैदल व अन्य संसाधनों से हरियाणा, फरीदाबाद, मुम्बई, तेलंगाना, गुडगांव आदि से घर की ओर चल दिए। मजदूरों का कहना है गांव पर ही खेती, पशुपालन व अन्य काम तलाशेंगे। अब दोबारा गैर प्रांतों में नौकरी करने कतई नहीं जाएंगे।
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- आंध्र प्रदेश से आए चाईछपरा निवासी रामजी भारती ने कहा 23 मार्च से कम्पनी बन्द हो गयी। इसके बाद पास में जो पैसा था खा रहे थे, लेकिन जब पैसे खत्म हो गए तो गांव आना मजबूरी हो गया। कारण कि वहां कम्पनी अथवा कोई समाजसेवी मदद के लिए आगे नहीं आया।
- महाराष्ट्र से आये दुर्जनपुर निवासी अवधेश वर्मा ने बताया कि हम लोग गरेंदर चलाने का काम करते थे। जिसके एवज में 11 हजार रुपये महीने का
ोला कम्पनी अब पैसा नहीं देगी, तुम लोग जहां जाना चाहते हो चले जाओ। तब हम लोग 26 लोग किराए पर ट्रक लेकर घर आए।
- सतना से आया श्रीनगर निवासी विनोद यादव ने कहाकि कम्पनी बन्द होने के बाद अब अपना पेट पालना भी मुश्किल हो गया था। जिससे पैदल पांच दिन में घर पहुंचे है। कहा अब दुबारा जाने की सवाल ही नहीं उठता है गांव पर ही कुछ करेंगे।
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- हरियाणा से आया श्रीनगर निवासी श्रीराम ने बताया कि स्पोर्ट का काम करते थे। ठेकेदार ने कहा कि जहां जाने चाहते हो चले जाओ। इसके बाद हम 22 लोग पैदल ही छह दिन में घर पहुंचे है। अब घर पर ही खेती व पशुपालन करेंगे, बाहर एक तो मेहनत के मुताबिक पगार नहीं मिलता, ऊपर से आफत के समय कोई पूछनहार नहीं है।
- गुजरात से आने वाला अधिसिझुवा निवासी सोनू ने बताया कंपनी बन्द होने के बाद ट्रक किराए पर लेकर हम लोग किसी तरह घर पहुंचे है। गांव पर ही कुछ ना कुछ छोटा मोटा व्यापार करेंगे।
- कोलकाता से आए नौरंगा निवासी राजेश साह ने कहा कम्पनी बन्द होने के बाद एक एक रुपये की आफत हो गयी थी। किसी तरह पैदल घर पहुंचा हूं अब बाहर नहीं जाकर गांव पर कोई धंधा करेंगे।
- नासिक से आए भरतछपरा निवासी धनोज कुमार ने कहा कम्पनी बन्द होने के बाद घर से पैसे मंगवा कर भोजन होता था। कम्पनी से पगार मिलना बंद हो गया। दीपावली व छठ तक जाने का कोई सवाल ही नहीं है। छठ पर्व बाद स्थिति सामान्य होने के बाद सोचेंगे।
- तेलंगाना से आया जगदेवा निवासी शैलेन्द्र भारती ने कहाकि कैसे-कैसे हम लोग 15 दिन में पैदल गांव पहुंचे है, मत पूछिए आंख से आंसू आ जाती है। गांव पर ही खेती बाड़ी या पशुपालन कर लेंगे, लेकिन अब कभी भी बाहर नही जाएंगे।
- मुंबई से आने वाले उपाध्यापुर निवासी संजीत ने बताया कि कम्पनी बन्द होने के बाद मैनेजर ने हाथ खड़ा कर दिया। कहा आप लोग घर चले जाओ। जिससे हम लोगों के पास रास्ते में खर्च के लिए पैसा भी नहीं था। घर से पैसा मंगवाकर ट्रक किराए पर लेकर घर पहुंचे है। अब दीपावली तक कुछ नही सोचना है इसके बाद फैसला लेंगे।
- बंगलौर से आया तालिबपुर निवासी मुकेश ने बताया कि गांव आ गए बस अब कैसे आये मत पूछिए। दु:खों को याद करने से ही डर लगता है। कहा अब कही नहीं जाना है गांव पर ही कुछ करेंगे।
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