केरल के मालाबार क्षेत्र में कालडी नामक स्थान पर पिता शिवगुरू एवं माता आर्याम्बा की संतान के रूप में अवतरित हुए शंकर आठ वर्ष की आयु में गुरू कुल से वेद शास्त्रों में निपुण होकर शंकराचार्य बन निकले।
यह बात मां भक्त कमेटी द्वारा शुक्रवार को आयोजित आदि गुरू शंकराचार्य जयंती समारोह के अवसर पर सभा को संबोधित करते हुए नगर विधानसभा के भाजपा नेता आनंद स्वरूप शुक्ल ने कही।
उन्होंने कहा कि वैदिक धर्म की पुर्नस्थाना के लिए माता की आज्ञा लेकर कर्म सन्यास ग्रहण कर लिया। शंकराचार्य ने मात्र 32 वर्ष की अवस्था में समाधि लेने से पूर्व पूरे भारत वर्ष में अद्धैत दर्शन एवं वैदिक धर्म की प्राचीनता, व्यापकता, सार्वभौमिकता एवं महत्ता का पुर्नस्थापन किया।
पूरे भारत को जोड़ने के लिए चारों दिशाओं में चार मठ की स्थापना की। इसमें पूर्व में गोवर्धपीठ, दक्षिण में जगन्नापूरी और पश्चिम में श्रृंगेरी में शारदा मठ और उत्तर में ज्योतिर्पीठ बुद्धिकाश्रम शामिल है।
कहा कि दक्षिण के क्षेत्र में उत्तर के ब्राह्मण और उत्तर के क्षेत्र के मठ पर दक्षिण के ब्राह्मण नियुक्त कर पूरे भारत को एकजुट करने का संदेश दिया। बौद्धों के अज्ञेयवाद एवं जैनों के निरीश्वरवाद के विरुद्ध वेद प्राणित सनातन धर्म, वैदिक धर्म को जन-जन तक पहुंचाने के लिए शंकराचार्य ने पंचांग पूजा शुरू कराई, जो आज भी जीवंत है।
राष्ट्र एवं धर्म विरोधी तत्वों को मुख्य धारा से बाहर कर शंकराचार्य ने जो वंदनीय कार्य किया है। वह आज भी हमारे लिए प्रेरणा स्रोत है। इस मौके पर राजीव मोहन चौधरी, रामजन्म यादव, अवध नारायण तिवारी, शशिकांत तिवारी आदि रहे।