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घरों में बंधा तिलवा-मेथी, साथ बहन-बेटियों में भी भेजी

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बलिया। मकर संक्रांति 15 जनवरी को है। इस दिन लोग शुभ मुहूर्त में स्नान करके तिल, तिलकुट, तिलवा आदि दान पुण्य करते है। इस दिन लोग भगवान को खिचड़ी का भोग लगाते हैं। इसके अलावा युवा इस दिन पतंगबाजी भी करते है।
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मकर संक्रांति को लेकर बाजार में तिल, तिलकुट, तिलवा, चिउरा, गुड़ आदि की दुुकानें सज गई है। इस पर्व को लेकर महिलाएं अपने-अपने घरों में गुड़ और चिउरा का तिलवा बांधा। वहीं लोग अपने-अपने बहन-बेटियों के यहां खिचड़ी भी भेज रहे है। तिलवा के लिए लोग भट्टियां (भरसाई ) में चिउरा, मकई, जोन्हरी भुनवाया। नगर से लेकर ग्रामीण क्षेत्रों के बाजारों में लोग चिउरा, लाई, गुड़ व बनी बनाई तिलवा की खरीदारी कर रहे है। दुकानदारों ने बताया कि चिउरा 35 से 50 रुपये, गुड़ 40 से 70 रुपये, तिलवा 80 रुपये और 100 रुपये के डेेढ़ किग्रा, तिल 170 से 200 रुपये है। इस साल गुड़ के मार्केट में तेजी आई है। इस दौरान लोगों ने रेडीमेड तिलवा की खरीददारी करते नजर आए।
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पहले संक्रांति से 20 दिन पहले ही बेटी व बहुओं के यहां बहंगी के द्वारा तिलवा व कपड़ा जाता था। वह अब कही देखने को नहीं मिल रहा है। तिलवा के स्थान आज भी चंद लोग मिष्ठान व कपड़ा भेजकर कोरम पूरा कर रहे है। यह परम्परा धीरे-धीरे विलुप्त हो चुकी है। वहीं गंगा स्नान के लिए रात में ही लोग गंगा घाट पहुंच जाते थे। लेकिन अब गंगा स्नान में वह भीड़ नहीं दिखती। वह भी अब कोरम ही पूरा हो रहा है।
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कमलेश नरायण पांडे, दयाछपरा
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-पहले और अब में बहुत अंतर आ गया है। खिचड़ी से बहुत पहले ही घर पर तिलवा, मेथी बांध दिया जाता था। जिसे घर के बच्चे घूम-घूम कर खाते थे। वह अब नहीं दिखता है। इसके साथ ही खिचड़ी के दिन सामर्थ्य अनुसार ब्राह्मण को भोजन कराया जाता था। लेकिन अब यह भी कोरम ही पूरा किया जा रहा है। आज कि युवा पीढ़ी इस परम्परा को धीरे-धीरे भूलती जा रही है। पहले बहन, बेटी व बहुओं के यहां प्रत्येक वर्ष कांवर से तिलवा व कपड़ा आदि कहार से भेजा जाता था। लेकिन यह अब दूर-दूर तक नहीं दिखती है।
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लल्लन पांडेय, पबाया छपरा
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