बलिया। उत्तर प्रदेश के पूर्वी छोर पर बसा बलिया जनपद, बलिया जंग-ए-आजादी का नायक रहा है। अगस्त क्रांति आंदोलन का पहला चरण नौ अगस्त 1942 को शुरू हुआ। 10 अगस्त को सुबह बलिया नगर के मध्य स्थित ओक्डेनगंज पुलिस चौकी से सटे पूरबी चौराहे पर गांधी जी की जय, भारत माता की जय तथा इंकलाब जिंदाबाद के नारे एकाएक गूंज उठे। 11 अगस्त को शहर में विद्यार्थियों ने जुलूस निकाला तथा चौक में सभा की। 12 अगस्त को क्रांतिकारियों ने जिले की संचार व्यवस्था छिन्न-भिन्न कर दी। 13 अगस्त को गुलामी की जंजीरों से आजाद होने के लिए स्वतंत्रता आंदोलन में महिलाएं भी कूद पड़ीं। 14 अगस्त को इस दिन शहर में प्राय: शांति रही, लेकिन जनपद के प्रमुख स्थानों पर विद्रोह ने उग्र रूप धारण कर लिया था। 15 अगस्त को रेवती में क्रांतिकारियों ने रेल लाइन उखाड़ने, जगह-जगह खाई खोदकर संपर्क मार्ग को बंद करने, एकजुटता प्रदर्शित करने के बाद रेवती को आजाद करा लिया। 16 व 17 अगस्त को भूपनारायण सिंह आदि की अगुवाई में भीड़ बैरिया थाने पर पहुंची। भीड़ को देख थानेदार काजिम हुसैन ने थाने पर तिरंगा फहरा कर जान बचाई। लेकिन रात में फोर्स बुलाकर फिर अंग्रेजी झंडा लगा दिया, तब 18 अगस्त को बैरिया थाने पर तिरंगा लहराने में 17 क्रांतिकारियों को जान गंवानी पड़ी। इसके बाद क्रांतिकारियों का आक्रोश ऐसा बढ़ा कि 19 अगस्त को जिला मुख्यालय पर क्रांति की ज्वाला धधक उठी। 19 अगस्त को लगभग 10 हजार लोग जेल के सामने एकत्र हुए और जेल में बंद चित्तू पांडेय की रिहाई की मांग करने लगे। तत्कालीन कलेक्टर का नियंत्रण प्रशासन पर नहीं रह गया था और उसे हार मानकर जेल के दरवाजे खोलने पड़े और वह चित्तू पांडेय से यह कहने को मजबूर हुआ कि पंडित जी अब आप ही इस भीड़ को संभालें और शांति व्यवस्था कायम रखने की जिम्मेदारी लें। इस तरह चित्तू पांडेय ने स्वाधीन बलिया की बागडोर संभाली और तीन दिनों के लिए बलिया स्वतंत्र हो गया।