सिद्धपीठों में एक नरहरि धाम का महत्व प्राचीन काल से है। मान्यता है कि यह कभी शिव का आश्रम रहा है, इसकी पुष्टि वाल्मिकी रामायण से होती है। यहां पर श्रद्धालु पूरी आस्था के साथ पूजन-अर्चन करते हैं। सावन में हर दिन द्वाबा ही नहीं अपितु बिहार से भी हजारों श्रद्धालु सरयू और गंगा का जल लेकर बाबा का जलाभिषेक करते हैं।
नरहरि धाम के वर्तमान मठाधीश्वर श्री श्री 1008 श्री दीनबंधु दीनानाथ दास उर्फ बनारसी बाबा ने वाल्मीकि रामायण की अनेक श्लोकों के माध्यम से नरहरि मठ को पूर्व काल का शिव का आश्रम बताते हुए कहा कि सती के वियोग में भगवान शिव यहां आकर अखंड समाधि लगाई थी। उसी समय से यह स्थान शिव का आश्रम माना जाता है।
यही नहीं यज्ञ की सुरक्षा के लिए विश्वामित्र के साथ जा रहे राम-लक्ष्मण ने भी यहां विश्राम किया था। वाल्मिकी रामायण के बालकांड के 23वें सर्ग के श्लोक संख्या पांच से 22 तक में नरहरि मठ के पूर्व में भगवान शिव के तपस्थली और राम लक्ष्मण सहित विश्वामित्र के रात्रि विश्राम का उल्लेख है।
बनारसी बाबा का कहना है कि अयोध्या से विश्वामित्र राम-लक्ष्मण के साथ सरयू नदी के किनारे चलते हुए अंतत: गंगा और सरजू के पवित्र संगम पर पहुंचते हैं। जहां भगवान स्थाणु (शिव) का पवित्र आश्रम है जो वाल्मीकि रामायण के श्लोक संख्या पांच और छह में वर्णित है। बनारसी दास ने बताया कि वर्तमान समय में गंगा और सरयू का पवित्र संगम सिताब दियर के पूर्व में स्थित है जो उस समय नरहरि मठ के पास हुआ करता था। क्षेत्रीय लोग भी अपने पूर्वजों के बताई बातों के आधार पर दो-तीन सौ साल पहले संगम तट नरहरि पीठ के पास होना बताते हैं।