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Ballia News: बिंदी कारोबारियों से हो रही वसूली

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अमर उजाला फाउंडेशन के तत्वावधान में मनियर कस्बा में आयोजित संवाद कार्यक्रम में उप​स्थित बिंदी क
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बलिया। जिले की मनियर की बिंदी ओडीओपी में शामिल होने के बाद भी अपने अस्तित्व को लेकर जूझ रही है। कारोबारी अब इससे मुंह मोड़ने लगे है। 150 साल पुराना कारोबार अब सीमित दायरे में आ गया है। पहले कोलकाता से लेकर वाराणसी, मुंबई व दिल्ली तक कारोबार होता था। दो दशक पूर्व तक व्यापारियों को कारोबारी माल तक नहीं दे पाते थे। इसे देखते हुए सरकार ने इसे टैक्स फ्री कर दिया था। उसके बाद भी इनकम टैक्स व पुलिस की वसूली जारी है, जिससे कारोबारी पूरी तरह से टूट गए हैं। वे किसी तरह खानदानी कारोबार को जीवंत करने में लगे हुए हैं। ओडीओपी में शामिल होने के बाद भी कारोबारियों को कोई फायदा नहीं हुआ। इस कारोबार से पहले मनियर क्षेत्र के लगभग 65 गांवों के 150 घरों की महिलाएं जुड़ी हुई थीं। अब 20 घरों तक सिमट कर रह गया है। पहले बिंदी का निर्माण हाथ से होता था अब मशीन से हो रहा है। सरकार के कच्चा माल पर 18 प्रतिशत जीएसटी से भी कारोबारी मुंह मोड़ने लगे हैं।
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मनियर के चांदूपाकड़ मोहल्ले बड़ी मस्जिद के पास अमर उजाला के संवाद कार्यक्रम में कारोबारियों ने कहा कि यूपी व बिहार में पुलिस व इनकम टैक्स के अधिकारी बिंदी लेकर जाते समय जीएसटी बिल व फर्म के कागज मांगते हैं। यह नहीं होने पर 5000 रुपये तक लेेते हैं। पुलिस भी पांच सौ से 1000 तक वसूल करती है। साथ ही जांच के नाम पर कार्टून में रखी बिंदी को बिखेर देते हैं। कई तरह की प्रताड़ना का सामना करना पड़ता है।
ऐसे पड़ा मनियर का नाम
मनियर का मनियर नाम क्यों पड़ा। बलिया जनपद से करीब 35 किलोमीटर उत्तर दिशा में सरयू नदी के तट पर बसा नगर पंचायत मनियर है। मनियर के पौराणिक इतिहास के विषय में यह बताया जाता है कि सरयू नदी के किनारे बसा यह गांव घना जंगल होने के कारण ऋषि मुनियों की तपोभूमि हुआ करती थी। बताया जाता है कि भगवान परशुराम ने यहीं पर तप किया करते थे। इसके कारण उनका यहां प्राचीन मंदिर है। घने जंगल में मणिधर सर्प भी रहा करते थे। मुनियों के तपस्या किए जाने के कारण इस नगर का नाम पहले मुनिवर पड़ा। फिर मणिधर सर्प रहने के कारण इसका नाम मणिवर पड़ा। उसी से मनियर हो गया है।
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1930 के दशक में कुमकुम रोली से होता था तैयार
बुजुर्ग कारोबारी शमीम अख्तर ने बिंदी के इतिहास पर चर्चा करते हुए बताया कि 1930 के दशक में रोली कुमकुम के स्थान पर सर्वप्रथम कांच की बिंदी का निर्माण मनियर में शुरू किया गया था। कांच को गलाकर इसे पाइप (धरनी) से फुलाया जाता था, फिर इसे जमने के बाद चौकोर काट लिया जाता था। इन्हें मिट्टी के तवे पर गर्म किया जाता था और इन गर्म टुकड़ों को रंगकर ठंडा कर लिया जाता था। अंत में इसे गोल और तिलक आकार में कैंची से काट लिया जाता था। कांच के बाद बिंदी प्लास्टिक के शीटों को रंगकर लोहे की डाई (पंच) से काटकर बनाया जाने लगा। इस काम में रैंबो शीट और एक्स-रे शीट का भी प्रयोग किया जा चुका है। अब फिलहाल वेलवेट बेस पर बिंदी बनती है। इसमें सलमा सितारे नग का प्रयोग किया जाता है।
गरीब परिवारों के बीच बिंदी बनाने का कार्य होता है। महिलाएं इसे पार्ट टाइम में करती हैं। प्रतिमाह दो से तीन हजार तक कमाई हो जाती है। माल भरने का कार्य अधिक हो रहा है। पिकअप पर माल जाता है तो पुलिस व इनकम टैक्स वाले परेशान करते है। वर्तमान समय में कारोबार पूरी तरह से मंदा है। पहले 10 से 12 कार्टून माल बेचा जाता था, अब मुश्किल से 2 से 3 कार्टून निकल रहा है। - दिलीप गुप्ता, कारोबारी
पहले बिंदी शीशे से बनती थी। डाई से काटकर चापर से बनाया जाता था। उसके बाद प्लास्टिक से बना, फिर समय बदलने के साथ वेलवेट पर आ गया। अब कुशल कारीगर भी नहीं हैं। उन्हें अब काम भी नहीं मिल रहा है। इसलिए वह दूसरे कारोबार में लग गए। बिंदी बनाने की डाई अब शोपीस बनकर रह गई है। - शमीम अख्तर, कारोबारी

हम लोगों की तीसरी पीढ़ी इस कारोबारी से जुड़ी है। अब अपने बच्चों को इस कारोबार से नहीं जोड़ रहे हैं। कारण कि दूसरे प्रांत के कारोबारी बकाया नहीं दे रहे हैं। हम अपने बच्चों को पढ़ा कर नौकरी में भेज रहे हैं। वे इस कारोबार में आना भी नहीं चाह रहे हैं। सऊदी अरब चले जा रहे है लेकिन कारोबार से नहीं जुड़ रहे हैं। -हाजी मोहम्मद इरफान, कारोबारी


हमारी तीसरी पीढ़ी इस कारोबार में लगी है। पहले लकड़ी के काठ पर लोहे की डाई से हाथ से बनाया जाता है। अब कंप्यूटराइज्ड हो गया है। पहले खपत अधिक थी। हम लोग प्रशिक्षण देकर कुशल कारीगर तैयार करते थे। गांव-गांव जाकर महिलाओं को प्रशिक्षण देने का भी कार्य होता था। एक सप्ताह तक उन्हें प्रशिक्षण दिया जाता था। दो माह उन्हें सीखने में लगते थे। -परवेज आलम, कारोबारी
हाथ से काम बंद हो गया, अब मशीन से होता है। यहां पर केवल पैकिंग ही हो रही है। ओडीओपी में शामिल होने के बाद भी कोई लाभ नहीं मिला। लोन लेने के लिए बैंक कर्मी मैनेजर को 20 प्रतिशत चाहिए, फिर फील्ड अफसर भी 10 प्रतिशत कमीशन मांगते हैं। ऐसे में लोन का आधा हिस्सा लेने में ही चल जाता था। इसलिए हम सभी लोन नहीं लेते हैं। - अली अकबर, कारोबारी
कई बार जनप्रतिनिधि व अधिकारियों के सामने कारोबार के संकट को उठाया गया लेकिन किसी स्तर पर सुनवाई नहीं हुई। कच्चा माल दिल्ली व मुंबई से आता है। यह काम करने वाली महिलाएं भी कम हो गई हैं। कच्चे माल पर चिपकाने व भरने का काम केवल हो रहा है। बनाने की प्रक्रिया लगभग बंद हो गई है। अब महिलाएं इससे अच्छा मुनाफा कढ़ाई व सिलाई में पा जा रही हैं। -मशरूर अहमद, कारोबारी
स्वास्थ्य सेवा व बिजली की जटिल समस्या
मनियर में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र है। लगभग 1.25 लाख आबादी के बीच स्थित इस स्वास्थ्य केंद्र पर चिकित्सक तो आते हैं लेकिन इलाज के नाम पर केवल रेफर ही है। किसी तरह की कोई इलाज की सुविधा नहीं है। जिला मुख्यालय से लगभग 35 किमी दूर इस इलाके के लाेगों को बेहतर इलाज के लिए जिला अस्पताल या मऊ वाराणसी जाना पड़ता है। लोगों ने कहा कि स्वास्थ्य सुविधाओं पर तनिक भी ध्यान नहीं दिया गया है।
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