नगरा। ब्लॉक में अधिकारियों की सांठगांठ से मनरेगा में खेल हो रहा है। स्थिति यह है कि धरातल पर आवास बने ही नहीं लेकिन मनरेगा से मजदूरी का भुगतान लाभार्थी के खाते में कर दिया जा रहा है। इस मामले में सचिव और मनरेगा से जुड़े अधिकारी एक-दूसरे पर ठीकरा फोड़ रहे हैं। इसका खुलासा सोशल आडिट में हुआ है। सोशल आडिट टीम ने इसकी रिपोर्ट उच्चाधिकारियों को भेज दी है।
ग्राम पंचायत ढेंकवारी में पनवा पत्नी हरिलाल के नाम से प्रधानमंत्री आवास स्वीकृत हुआ था। उसे आवास की प्रथम किश्त 40 हजार रुपये उसके खाते में भेज दी गई है। यहां तक कि मनरेगा से 90 दिन की मजदूरी 18390 रुपये भी भेज दिए गए। नियम यह है कि आवास बन जाने पर 90 दिन की मजदूरी भेजी जाती है। बीआरपी पुष्पा के नेतृत्व में जब सोशल आडिट टीम गांव में पहुंची तो धरातल पर न आवास बना मिला, न ही लाभार्थी का ही पता चला। ग्रामीणों ने टीम को बताया कि लाभार्थी इस गांव में रहती ही नहीं। न ही उसके नाम से कोई जमीन ही है। तत्कालीन ग्राम पंचायत अधिकारी अविनाश कुमार का कहना है कि जब आवास की प्रथम किश्त लाभार्थी को मिली थी, तभी वस्तुस्थिति से पत्र द्वारा खंड विकास अधिकारी को अवगत करा दिया गया था। दूसरा प्रकरण भीटकुना ग्राम पंचायत में सोशल आडिट टीम को मिला। ग्राम पंचायत के डूमाडांड में लालमती पत्नी रामचंदर का नाम आवास की सूची में था। उसे आवास की कोई किश्त नहीं मिली। अपने पैसे से पक्का मकान बनवा लिया। इसके बाद, उसे आवास आवंटित नहीं किया गया। कुछ दिनों के बाद यूपी बड़ौदा बैंक में संचालित लाभार्थी के खाते मनरेगा से 30 दिन की मजदूरी 18390 रुपये भेज दी गई। एपीओ मनरेगा ज्ञानेंद्र यादव का कहना है कि सचिवों द्वारा सूचना न दिए जाने से मजदूरी का भुगतान हो गया है। इसकी सारी जिम्मेदारी सचिव की है। दोनों लाभार्थियों से मनरेगा मजदूरी की धनराशि की रिकवरी कराई जाएगी।