दुबहर। मिटे न जो मिटाने से कहानी उसको कहते हैं, वतन के काम जो आए जवानी उसको कहते हैं...। इस पंक्ति को चरितार्थ करने वाले प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के शहीद मंगल पांडेय ने फांसी पर चढ़कर अंग्रेजों को एहसास करा दिया था भारत माता के लाल अब जाग चुके हैं। अब अंग्रेजों की खैर नहीं है। शहीद मंगल पांडेय की जयंती पर रविवार को जनपद के विभिन्न क्षेत्रों में रविवार को कार्यक्रम आयोजित होंगे।
महान क्रांतिकारी शहीद मंगल पांडेय का जन्म 30 जनवरी 1831 को नगवा गांव के एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था। मंगल पांडेय सेना में भर्ती हुए उस समय सेना में धर्म के अनुसार वेशभूषा में रहने की छूट थी। हिंदू सिपाहियों के लिए माथे पर तिलक लगाना और मुसलमान सिपाहियों को दाढ़ी रखना आम बात थी। उस समय सेना में अंग्रेजों की ओर से सैनिकों को ईसाई बनाने का कुचक्र चल रहा था। पश्चिम बंगाल के बैरकपुर में एक फैक्ट्री थी जहां कारतूस बनाए जाते थे। उस फैक्ट्री के अधिकांश कर्मचारी अनुसूचित समुदाय के थे। एक दिन प्यास लगने पर फैक्ट्री के एक कर्मचारी ने सैनिक मंगल पांडेय से एक लोटा पानी मांगा। मंगल पांडेय ने उस कर्मचारी को यह कह कर पानी देने से मना कर दिया कि वह अछूत है। यह बात उस कर्मचारी को चुभ गई। उसने कटाक्ष करते हुए मंगल पांडेय से कहा कि उस समय में तुम्हारा धर्म कहां रह जाता है जब बंदूक में कारतूस डालने से पहले उसे दांत से तोड़ते हो। उस कारतूस पर गाय और सुअर की चर्बी लगी होती है। वह कर्मचारी मातादीन था। जिसने भारतीय सैनिकों की आंखें खोल दी।
इसके बाद 29 मार्च 1857 को मंगल पांडेय ने अंग्रेजों के खिलाफ बगावत का बिगुल फूंक दिया। परेड ग्राउंड में ही अंग्रेज अफसर बाब और सार्जेंट मेजर ह्यूसन को मौत के घाट उतार दिया। मंगल पांडेय ने सभी सिपाहियों को गोली पर चर्बी लगी होने की बात बताते हुए सिपाहियों से अंग्रेजों से बदला लेने की बात कही। अंग्रेज अफसर कर्नल हृलर घटनास्थल पर पहुंचा और सिपाहियों को मंगल पांडेय को गिरफ्तार करने का आदेश दिया। लेकिन एक भी सैनिक मंगल पांडेय को गिरफ्तार करने के लिए आगे नहीं आया। यह घटना पूरे देश में जंगल की आग की तरह फैली। सिपाहियों में अंग्रेज अफसरों के विरुद्ध बगावत का विद्रोह सुलग रहा था। मंगल पांडेय को गिरफ्तार कर लिया गया। फौजी अदालत में उन पर मुकदमा चला। उन्हें फांसी की सजा सुनाई गई। बैरकपुर के परेड मैदान में फांसी का मंच बनाया गया। सात अप्रैल को सुबह फांसी दी जानी थी लेकिन बैरकपुर के जल्लाद ने मंगल पांडेय को फांसी देने से मना कर दिया। अंत में कोलकाता से जल्लाद बुलाए गए। अंग्रेज अफसर जर्नल हिय्रसी ने सात अप्रैल को निर्देश जारी किया कि आठ अप्रैल 1857 को सुबह 5:30 बजे ब्रिगेड परेड के मैदान में 34वीं देशी पैदल सेना के 19वीं रेजीमेंट नेटिव इन्फेंट्री की पांचवी कंपनी के 1446 नंबर के सिपाही मंगल पांडेय को फांसी दी जाएगी। मंगल पांडे के इस बलिदान ने समूचे भारत वासियों को झकझोर कर रख दिया जगह-जगह अंग्रेजों के खिलाफ बगावत के बिगुल फूंक दिया गया। उसी समय से अंग्रेजो के खिलाफ आजादी की लड़ाई शुरू हुई जिसका परिणाम 15 अगस्त 1947 को देश आजाद हो करके मिला।
स्मारक धराशायी होने के कगार पर
दुबहर। देश की आजादी के लिए पहली कुर्बानी देकर स्वतंत्रता संग्राम की लौ जलाने वाले शहीद मंगल पांडेय के पैतृक गांव नगवा में स्थित स्मारक पार्क धराशायी होने की कगार पर है। स्वतंत्र संग्राम के प्रथम शहीद मंगल पांडेय का स्मारक पार्क 1990 में तैयार हुआ। समुचित देखभाल के अभाव में स्मारक पार्क इस समय बिल्कुल जर्जर हो गया है। वह कब धराशाई हो जाए यह कहा नहीं जा सकता। इसको बनवाने तथा इसकी मरम्मत कराने के लिए मंगल पांडे के नाम पर संचालित संस्था मंगल पांडे विचार मंच ने कई बार जिले के जनप्रतिनिधियों एवं प्रशासनिक अधिकारियों का ध्यान भी आकृष्ट कराया, लेकिन किसी ने इस तरफ कोई ध्यान नहीं दिया। इसको लेकर मंगल पांडे विचार मंच ही नहीं बल्कि क्षेत्र के लोगों में काफी आक्रोश है। उनका कहना है कि देश की आजादी के लिए कुर्बान हुए शहीद मंगल पांडे के स्मारक पार्क का सुंदरीकरण तथा उनकी स्मृतियों को संजोए रखने की जिम्मेदारी हमारे जिम्मेदार जनप्रतिनिधियों एवम प्रशासनिक अधिकारियों की भी है। इसे समय रहते पूरा किया जाना चाहिए।