बलिया। लोहिया संस्थान एवं लोकतंत्र सेनानी के संयुक्त तत्वावधान में सोबईबांध स्थित स्वतंत्रता संग्राम सेनानी पं. वृंदावन मिश्र स्मृति परिसर में रविवार को लोकबंधु राजनारायण की जयंती पर स्मृति सभा हुई।
अध्यक्षता करते हुए द्विजेन्द्र कुमार मिश्र ने कहा कि संघर्षों के नायक लोकबंधु राजनारायण साल 1942 से जीवन के अंतिम क्षण तक अन्याय एवं जुल्म का प्रतिरोध करते रहे। नौ अगस्त 1942 को साथियों के साथ झाडू-टोकरी लेकर हरिजन बस्ती में सफाई के लिए जा रहे थे। बीएचयू गेट के पास एक पान के दुकानदार ने पूछा कि नेताजी कहां जा रहे हो। रात को ही मुंबई में गांधी-नेहरू को गिरफ्तार कर लिया गया है।
इसके बाद लोकबंधु सफाई का सारा सामान वहीं छोड़कर मालवीय भवन गए, जहां डॉ. राधाकृष्णन हर रविवार को गीता पर प्रवचन कर रहे थे। लोकबंधु ने डॉ. राधाकृष्णन से पूछा कि गुरूजी, गीता पर प्रवचन ही होगा या कुरुक्षेत्र में जाने का आदेश भी होगा। तब डॉ. राधाकृष्णन ने पूछा कि क्या हुआ? लोकबंधु ने गिरफ्तारी का जिक्र किया। इसके बाद डॉ. राधाकृष्णन ने संघर्ष में जाने का आदेश दिया। राजनारायण के साथ सभागार से युवा समुदाय ने मडुआडीह स्टेशन की तरफ कूच किया और स्टेशन को जला दिया। राजनारायण जीवन पर्यंत समाज के अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्तियों की भलाई के बारे में सोचते रहे। 1952 से 1962 तक उप्र विधानसभा के सदस्य रहे। 1956 में उप्र में अकाल पड़ा। विधानसभा में सवाल उठाने पर लोकतंत्र के इतिहास में ऐसी कोई घटना नहीं हुई होगी, जैसा राजनारायण के साथ हुआ। उनकी ऐसी पिटाई हुई कि लंगोट के सिवाय उनके शरीर पर कुछ नहीं बचा था। उन्होंने कहा कि ‘गरीबों को मिले रोटी, तो मेरी जान भी सस्ती है’। उनकी स्मृतियों को नमन। इस मौके पर अजय बहादुर सिंह, निर्भय नारायण सिंह, शिवशरण तिवारी, संतोष कुमार शुक्ल, देवेन्द्र नाथ त्रिपाठी, राजऋषि सिंह, सिद्धेश्वर नाथ यादव, रवि मिश्र, जिउत बाबू, शाहिद अली खां आदि मौजूद रहे।