तीन तरफ से नदियों से घिरे बगावती तेवर वाले बलिया जिले में समस्याएं कई हैं। चुनावी चर्चा में मुद्दे भी छा रहे हैं। महंगाई, बेरोजगारी को लेकर लोग मुखर भी नजर आते हैं, लेकिन बात जब मतदान की आती है तो हार-जीत का गणित जातीय गोलबंदी पर आकर टिक जाती है। एक चीज साफ है सीट पर भाजपा और सपा के बीच सीधी और कांटे की टक्कर दिखाई दे रही है। चुनाव में वैश्यों के साथ ही छोटी जातियों और बसपा को कोर वोटबैंक निर्णायक साबित हो सकते हैं।
बलिया लोकसभा सीट पर रिकॉर्ड आठ बार पूर्व प्रधानमंत्री चंंद्रशेखर ने जिले का प्रतिनिधित्व किया। 1977 से 2007 के बीच में उन्हें सिर्फ एक बार पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के बाद उपजे सहानुभूति की लहर में कांग्रेस प्रत्याशी से हार का सामना करना पड़ा था।
इस बार भाजपा ने वर्तमान सांसद वीरेंद्र सिंह मस्त के स्थान पर राज्यसभा सांसद नीरज शेखर को अपना प्रत्याशी बनाया है। चंद्रशेखर के पुत्र होने का थोड़ा लाभ उन्हें मिल रहा है, लेकिन यह प्रभावी कितना होगा यह तो परिणाम ही बताएगा। सपा ने पिछला चुनाव मात्र साढ़े 15 हजार वोटों से हारने वाले सनातन पांडेय को इस बार फिर से मैदान में उतारा है। भाजपा जहां इसी सीट से हैट्रिक लगाने के लिए पूरा जोर लगा रही है, वहीं सपा अपनी खोई सीट पाने के लिए जी जान से जुटी हुई है।
स्थानीय मुद्दे
बाढ़ और कटान : तीन तरफ से गंगा और सरयू नदी से घिरे बलिया जिले में प्रतिवर्ष बाढ़ और कटान की विभीषिका देखने को मिलती है। प्रतिवर्ष करोड़ों की धनराशि भी खर्च होती है, लेकिन कोई स्थायी समाधान नहीं मिलता।
स्वास्थ्य व्यवस्था : प्रदेश के आखिरी छोर पर बसे बलिया जिले की खराब स्वास्थ्य व्यवस्था भी सरकार के दावों पर सवाल खड़े करती है। सर्दी, जुकाम, बुखार को छोड़ दें तो यहां के अस्पताल सिर्फ रेफर करने का ही काम करते हैं। मेडिकल कालेज भी यहां तीन चुनावों से सिर्फ चुनावी वादा ही बन रहा है।
रोजगार : पूर्वांचल एक्सप्रेस-वे के बहाने प्रदेश के पूर्वी छोर के जिलों को उद्योग से जोड़ने के वादे जरूर हुए, लेकिन बलिया इससे अछूता ही रह गया। रोजगार की तलाश में यहां के युवाओं का पलायन अभी भी जारी है।
जातिगत स्थिति
| ब्राह्मण |
15.5 प्रतिशत |
| अनुसूचित जाति |
15.3 प्रतिशत |
| राजपूत |
13.8 प्रतिशत |
| यादव |
12.3 प्रतिशत |
| भूमिहार |
8.9 प्रतिशत |
| मुसलमान |
6.59 प्रतिशत |
| अनुसूचित जनजाति |
3.4 प्रतिशत |
| कुर्मी |
3.4 प्रतिशत |
| कुशवाहा |
4.1 प्रतिशत |
| पाल व बघेल |
2.4 प्रतिशत |
| निषाद |
3.3 प्रतिशत |
| राजभर |
4.90 प्रतिशत |