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विलुप्त होती जा रही सावन की कजरी

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दया छपरा। एक दौर था जब सावन के शुरू होते ही बारिश की फुहारों संग पेड़ों पर झूले व कजरी का मिठास पूरे वातावरण में घुल जाया करती थी। लेकिन अब ऐसा नहीं है। सावन बीतने को है, लेकिन न कहीं झूला और न ही कहीं कजरी के बोल ही सुनाई पड़ रहे हैं। परंपराएं लुप्त होती जा रही हैं।
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क्षेत्र के लुटईपुर निवासी 85 वर्षीय सुशीला देवी ने बताया कि पहले गांव की लड़कियां सावन का इंतजार करती थीं। भोजपुरी में बात करते हुए कहा कि सावन के आवते हर घर में झूला डाल के नया नया कनिया संगे गांव के लईकी सब झूला झूलत कजरी के गीत सब गावत गावत रहली ,जवन बड़ा निक लागत रहे। कजरी में पिया मेंहदी मंगा द मोती झील से, जाई के साइकिल से ना, पिया मेंहदी मंगा द, छोटकी ननदी से पिसा द, हमरा हथवा पर चढ़ा द, कांटा कील से, हरि हरि बाबा के दुवरिया मोरवा बोले ए हरि आदि काफी प्रचलित रही। कजरी गीत नई नवेली दुल्हन गांव की लड़कियां गाकर हास्य परिहास के साथ मनोरंजन किया करती थी।
यही नहीं खेतों में सोहनी के समय महिला मजदूर भी कजरी गीत गाकर सावन का जश्न मनाती थीं। लेकिन आज झूला और कजरी बीते जमाने की बात हो गई है। ननंद भौजाई का रिश्ता नदी के दो पाटों की तरह हो गए हैं। दया छपरा निवासी मुन्नी पाण्डेय ने बताया कि पहले प्रेम घर में ही नहीं आस पड़ोस में भी था। टोला भर की लड़कियां एक जगह इकट्ठा होकर कजरी गायन करती थीं। लेकिन आज प्रेम का अभाव साफ दिखता है। रिंकी गुप्ता का कहना है कि समय के अभाव के चलते कजरी गीत तो दूर कई घरेलू परंपराएं दूर होती जा रही हैं। पहले संयुक्त परिवार था एक परिवार में 10 लोग थे सब लोग एक जगह मिल बैठकर बातों बातों में ही हास परिहास शुरू कर देते थे पर आज संयुक्त परिवार टूटता जा रहा है और एकांकी परिवार लोक परंपराओं को निभाने का समय ही नहीं दे पाता।
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डोमन राय के टोला निवासी पूनम पाण्डेय का कहना है कि पहले भारतीय शिक्षा पद्धति के अनुसार पढ़ाई होती थी अब अंग्रेजी की पढ़ाई हो रही है। विभिन्न तरह के काम से फुर्सत ही नहीं मिलती। कजरी के लिए अब गांवों में माहौल ही नहीं रहता है।
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