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शासन ने लिया ददरी मेला के लिए जमीन अधिग्रहण मामले का संज्ञान

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बलिया। जिले में प्रतिवर्ष कार्तिक पूर्णिमा के अवसर पर लगने वाले ददरी मेला के अस्तित्व को लेकर सवाल खड़े होने के मामले में शासन ने संज्ञान लिया है। इस बार कार्तिक पूर्णिमा 30 नवंबर को पड़ रही है, लेकिन अभी तक मेला के आयोजन को लेकर स्थिति स्पष्ट नहीं है। पिछले 15 सालों में ये मेला उस स्थान से लगना शुरू हो रहा है, जहां कभी यह समाप्त होता था। यह स्थिति मेला क्षेत्र में स्थिति जमीनों के लगातार बिकने और उन पर आवास-दुकान आदि बनने के कारण उत्पन्न हुई है। जबकि यह इलाका बंधे के दूसरी तरफ (डूब क्षेत्र) है और उधर पक्का निर्माण पर पूर्णतया रोक है। गौरतलब हो कि बीते आठ अक्तूबर को अमर उजाला ने मुद्दे को प्रमुखता से उठाया था।
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जिले के ध्रुवजी सिंह स्मृति सेवा संस्थान के सचिव भानु प्रकाश सिंह बबलू ने मेला को राजकीय का दर्जा देने और मेला क्षेत्र की जमीनों के अधिग्रहण को लेकर पीएम नरेंद्र मोदी, सीएम योगी आदित्यनाथ समेत दर्जनों अधिकारियों को पत्र लिखा था। अब उनके पत्र पर विशेष सचिव मुख्यमंत्री शुभ्रांत कुमार शुक्ला व अमित कुमार सिंह ने प्रमुख सचिव आवास/नगर विकास को भेजा था। मुख्यमंत्री के विशेष कार्याधिकारी अजय कुमार सिंह की ओर से अपर मुख्य सचिव राजस्व को भी पत्र भेजा गया। इसी क्रम में प्रमुख सचिव नगर विकास तथा अपर मुख्य सचिव राजस्व ने आवश्यक कार्रवाई के लिए पत्र जिलाधिकारी बलिया को भेजा। जिलाधिकारी ने उक्त पत्र् अधिशासी अधिकारी नगर पालिका बलिया को भेजकर आख्या मांगी है। पत्र की कॉपी अपर जिलाधिकारी/विशेष भूमि अध्यापित अधिकारी को भी भेजी गई है। अपर जिलाधिकारी ने भी नगर पालिका बलिया को पत्र भेजकर अग्रिम कार्यवाही करने व कृत कार्यवाही से जिलाधिकारी को भी अवगत कराने का निर्देश दिया है।
पत्र में मेले के अस्तित्व पर उठाया गया है सवाल
पत्र में सिंह ने लिखा था कि पौराणिक काल से महर्षि भृगु द्वारा गंगा नदी की जलधारा को समृद्ध बनाये रखने हेतु शिष्य दर्दर मुनि के नेतृत्व में भृगु संहिता के लोकार्पण की स्मृति में ददरी मेला का शुभारंभ किया गया था। इस मेला को लगाने के लिए पिछले सैकड़ों वर्षों से बलिया शहर के दक्षिणी सीमा पर गंगा नदी के छाड़न बालेश्वर घाट (शनिचरी मंदिर) से जमुवा गोपालपुर तक नदी के डूब क्षेत्र में प्रतिवर्ष लगभग 130 एकड़ भूमि अधिग्रहीत की जाती है।
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इसके एवज में किसानों को नगर पालिका बलिया की ओर से मुआवजा भी दिया जाता है। वर्तमान में भू स्वामियों द्वारा मेला क्षेत्र की जमीनों का विक्रय निरंतर किया जा रहा है। खरीदारों द्वारा कृषि कार्य न कर बगैर भूमि की नवैयत परिवर्तन कराए विनियमित क्षेत्र एवं नगर पालिका परिषद् की मिलीभगत से डूब क्षेत्र में निर्माण निषेध होने के बावजूद निरंतर आवासीय भवनों का अवैध रूप से निर्माण किया जा रहा है। इसके कारण ददरी मेला की भूमि संकुचित होती जा रही है। हाल ये है कि इस समय यह मेला वहां से प्रारंभ हो रहा है, जहां लगभग 15 वर्ष पहले समाप्त हुआ करता था। इससे इस प्राचीन मेला के अस्तित्व पर ही संकट खड़ा हो गया है।
देश का दूसरा सबसे बड़ा पशु मेला भी है ददरी
पत्र में सिंह ने मेला की ऐतिहासिकता को लेकर भी जानकारी दी थी। उन्होंने बताया था कि ददरी मेला में संत-महात्मा संगम पर पुरे कार्तिक मास तक कल्पवास करते हैं। इसी दौरान संत समागम व भृगु क्षेत्र की पंचकोषी परिक्रमा यात्रा भी होती है। कार्तिक पूर्णिमा पर लाखों श्रद्धालुओं के स्नान के साथ ही महीने भर चलने वाला ददरी मेला प्रारम्भ होता है। इस मेला की पहचान देश के दूसरे सबसे बड़े पशु मेला के रूप में भी है, जिसका जिक्र चीनी यात्री फाह्यान द्वारा अपनी पुस्तक में किया गया है।
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